लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

Archive for October 9th, 2007

कत्लें आम किया

Posted by hemjyotsana "Deep" on October 9, 2007

क्यूँ ज़ुबान छीनी मेरी , क्यूँ मुझे बेज़ुबान किया ।
मैंने कब तेरी बेवफ़ाई का चर्चा खुलेआम किया ।

ये माना के मैं निभा ना सका रस्म-ए-उल्फत ,
तुने भी कहाँ - कब , वफ़ा का कोई काम किया ।

इसी से बहल जायेगा दिल नादां ही तो है ,
तेरी गली में करके सज़दे हमने बहुत नाम किया ।

परदे में रखा है तेरा नाम साये को भी खबर नहीं ,
तुने ही बदनाम मुझे , बेवजह सर-ए-आम किया ।

सभी ने लगाये इल्ज़ाम मेरी बेगुनाई पर बहुत ,
कहा तुने भी, दीप ने परवानो का कत्लें आम किया ।

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