राम कहाँ से लाऊ
Posted by hemjyotsana "Deep" on October 1, 2007
जो युग बीत गया हो उसका अंजाम कहाँ से लाऊ ,
कलयूग मैं रहने वाला हूँ राम कहाँ से लाऊ .
सीता को भी ढूँढा लेकिन मिल ना पाया अब तक ,
सीता का जो त्याग करें वो राम कहाँ से लाऊ .
कलयूग मैं रहने वाला हूँ राम कहाँ से लाऊ .
कुंज कुंज की गलिन गलिन में ,वृन्दावन के वृक्ष वृक्ष में ,
माखन मुरली छोड़ गया जो वो श्याम कहाँ से लाऊ .
शिव शंकर का अंश है आख़िर ,राम के संग रहते है जो,
संकट से हर बार बचायं वो हनुमान कहाँ से लाऊ .
कण कण में विष भरा हुआ हैं ,
राम रहें जहाँ इतना पावन धाम कहाँ से लाऊ .
कलयूग मैं रहने वाला हूँ राम कहाँ से लाऊ .






October 1, 2007 at 9:11 pm
सुंदर पंक्तियों से रची हुई रचना है…
मगर एक बात समझ नहीं पाया कि
सीता का त्याग करे……… यह तो
राम के Dark Side को दिखाता है
पर आपकी कविता का लगभग अंश
एक कुछ और यानि इस जगत और
सत्य की परख कर रहा है…।
October 1, 2007 at 9:28 pm
दिल के मंदिर में पूरी आस्था के साथ ढ़ूंढ़े, सब वहीं मिलेंगे.
-बढ़िया प्रयास है, जारी रखें.
October 2, 2007 at 3:22 am
समीर भाई से मैं सहमत हूं -’दिल के मंदिर में पूरी आस्था के साथ ढ़ूंढ़े, सब वहीं मिलेंगे.’
दिव्याभ, तुम जिस Dark Side की बात कर रहे हो, हो सकता है हेमज्योत्स्ना का आज
के सत्ताधारीयों की तरफ इंगित हो। राम ने प्रजा के हित को इतना सर्वोपरि
स्थान दिया कि उसके सामने पत्नि का त्याग भी गौण था। इसके विपरीत वर्तमान
सत्ताधारियों के लिए निजी स्वार्थ के सामने अन्य सभी कार्य गौण हैं।
हाँ, यह विषय अलग है कि राम के इस कार्य को औचित्य दिया जाए या नहीं!
जहां तक कविता की बात है, बहुत सुंदर रचना है।
October 2, 2007 at 5:51 pm
आदरणीय महावीर जी ,समीर जी , और दिव्याभ जी
सर्वप्रथम बहुत बहुत धन्यवाद आप सभी की प्रतिक्रियाओं से बहुत प्रोत्साहन मिलता हैं .
मैं भी महावीर जी की तरह समीर जी की बात से सहमत हूँ “दिल के मंदिर में पूरी आस्था के साथ ढ़ूंढ़े, सब वहीं मिलेंगे”
और दिव्याभ जी की बात का जवाब महावीर जी ने जो दिया उस जवाब के बाद मुझ कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं .
फिर भी , राम के सीता त्याग पर सदैव प्रश्न उठता रहा है , पर मर्यादा पुरुषोतम राम ने जब सीता को त्याग कर प्रज़ा हित में फ़ैसला लिया और मर्यादा की सीमा को छुआ जिसके लिए उन्होने अवतार लिया था .
आशा हैं आगे भी आप अपनी अमुल्य प्रतिक्रिया देते रहेगे .
एक बार फिर धन्यवाद ,
सादर
हेम ज्योत्स्ना
October 3, 2007 at 2:33 pm
पढ कर आश्चर्य हुआ।
आजकल भी ऐसी कविताएं लिखी जाती है।
October 9, 2007 at 8:51 pm
अच्छी बन पड़ी है ।
थोड़ी आशावादिता में कह दूँ -
तेरे तन में राम , मन में राम, रोम रोम में राम रे ….
December 16, 2007 at 2:23 am
its realy very good i have no wards to say after to read the other commends.
thanks its realy good