लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

राम कहाँ से लाऊ

Posted by hemjyotsana "Deep" on October 1, 2007

जो युग बीत गया हो उसका अंजाम कहाँ से लाऊ ,
कलयूग मैं रहने वाला हूँ राम कहाँ से लाऊ .
सीता को भी ढूँढा लेकिन मिल ना पाया अब तक  ,
सीता का जो त्याग करें वो राम कहाँ से लाऊ .
कलयूग मैं रहने वाला हूँ राम कहाँ से लाऊ . 
 कुंज कुंज की गलिन गलिन में ,वृन्दावन के वृक्ष वृक्ष में ,
माखन मुरली छोड़ गया जो वो श्याम कहाँ से लाऊ .
शिव शंकर का अंश है आख़िर ,राम के संग रहते है जो,
संकट से हर बार बचायं वो हनुमान कहाँ से लाऊ .
कण कण में विष भरा हुआ हैं ,
राम रहें  जहाँ  इतना पावन धाम कहाँ से लाऊ .
कलयूग मैं रहने वाला हूँ राम कहाँ से लाऊ .

7 Responses to “राम कहाँ से लाऊ”

  1. divyabh Says:

    सुंदर पंक्तियों से रची हुई रचना है…
    मगर एक बात समझ नहीं पाया कि
    सीता का त्याग करे……… यह तो
    राम के Dark Side को दिखाता है
    पर आपकी कविता का लगभग अंश
    एक कुछ और यानि इस जगत और
    सत्य की परख कर रहा है…।

  2. समीर लाल Says:

    दिल के मंदिर में पूरी आस्था के साथ ढ़ूंढ़े, सब वहीं मिलेंगे.

    -बढ़िया प्रयास है, जारी रखें.

  3. महावीर Says:

    समीर भाई से मैं सहमत हूं -’दिल के मंदिर में पूरी आस्था के साथ ढ़ूंढ़े, सब वहीं मिलेंगे.’
    दिव्याभ, तुम जिस Dark Side की बात कर रहे हो, हो सकता है हेमज्योत्स्ना का आज
    के सत्ताधारीयों की तरफ इंगित हो। राम ने प्रजा के हित को इतना सर्वोपरि
    स्थान दिया कि उसके सामने पत्नि का त्याग भी गौण था। इसके विपरीत वर्तमान
    सत्ताधारियों के लिए निजी स्वार्थ के सामने अन्य सभी कार्य गौण हैं।
    हाँ, यह विषय अलग है कि राम के इस कार्य को औचित्य दिया जाए या नहीं!
    जहां तक कविता की बात है, बहुत सुंदर रचना है।

  4. hemjyotsana parashar Says:

    आदरणीय महावीर जी ,समीर जी , और दिव्याभ जी
    सर्वप्रथम बहुत बहुत धन्यवाद आप सभी की प्रतिक्रियाओं से बहुत प्रोत्साहन मिलता हैं .
    मैं भी महावीर जी की तरह समीर जी की बात से सहमत हूँ “दिल के मंदिर में पूरी आस्था के साथ ढ़ूंढ़े, सब वहीं मिलेंगे”
    और दिव्याभ जी की बात का जवाब महावीर जी ने जो दिया उस जवाब के बाद मुझ कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं .
    फिर भी , राम के सीता त्याग पर सदैव प्रश्न उठता रहा है , पर मर्यादा पुरुषोतम राम ने जब सीता को त्याग कर प्रज़ा हित में फ़ैसला लिया और मर्यादा की सीमा को छुआ जिसके लिए उन्होने अवतार लिया था .
    आशा हैं आगे भी आप अपनी अमुल्य प्रतिक्रिया देते रहेगे .

    एक बार फिर धन्यवाद ,

    सादर
    हेम ज्योत्स्ना

  5. Annapurna Says:

    पढ कर आश्चर्य हुआ।
    आजकल भी ऐसी कविताएं लिखी जाती है।

  6. Prem Says:

    अच्छी बन पड़ी है ।

    थोड़ी आशावादिता में कह दूँ -

    तेरे तन में राम , मन में राम, रोम रोम में राम रे ….

  7. raman mehat Says:

    its realy very good i have no wards to say after to read the other commends.
    thanks its realy good

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