मैं दो कदम चलता
Posted by hemjyotsana "Deep" on September 29, 2007
मैं दो कदम चलता और एक पल को रुकता मगर………..
इस एक पल जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ जाती ।
मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और….
जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती ।
युँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और….
जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती ।
ये सिलसिला यहीं चलता रहता…..
फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पुछा……….
” तुम हार कर भी मुस्कुराते हो ! क्या तुम्हें दुख नहीं होता हार का ? “
तब मैंनें कहा…………….
मुझे पता हैं एक ऐसी सरहद आयेगी जहाँ से आगे
जिन्दगी चार कदम तो क्या एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी,
तब जिन्दगी मेरा इन्तज़ार करेगी और मैं……
तब भी युँ ही चलता रुकता अपनी रफ्तार से अपनी धुन मैं वहाँ पहुँगा…….
एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउगा……….
बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाँउगा।
ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउगा………
मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और अपनी जीत पर भी……
मगर जिन्दगी अपनी जीत पर भी ना मुस्कुरा पाई थी
और अपनी हार पर भी ना रो पायेगी ।
बस तभी मैं जिन्दगी को जिन्दगी जीना सीखा जाउँगा।






September 29, 2007 at 2:16 pm
mind blowing dost dil jeet liya keep it up
September 29, 2007 at 7:48 pm
bahut sundar likha hai aapne.
September 29, 2007 at 8:02 pm
अच्छा ख्याल है!!
September 29, 2007 at 9:14 pm
पुन: एक खूबसूरत रचना पढ़ने को मिली…
बहुत खुब…।
October 1, 2007 at 4:57 am
वाह! बहुत अच्छा लिखती हो। ख़यालों की गहराई को देख कर पढ़ने वाला वहीं थम जाता है। ऐसे ही
लिखती रहो।
December 8, 2007 at 8:59 pm
it’s simply great. how superbly the reality of “zindagi” has been descibed. great work-keep it up
February 13, 2008 at 12:36 am
bahut bahut bahut pyaara vichaar..
February 13, 2008 at 7:05 pm
grt
February 19, 2008 at 12:42 pm
good i like it
February 21, 2008 at 6:48 pm
ise dek kar me samjha ki jindagi kaise jiye jatehai