लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

दीप और अन्धेरा

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on सितम्बर 28, 2007

शाम आखों में उठा के एक साया , अधुरा था अन्धेरे में ,

  रोशनी जो की , छिप गया , इससे तो बहत्तर था अन्धेरे में ।

 चलो आज़मां कर देख लें रोशनी को भी फिर से ,

रोशनी में भी देखें क्या मिलता है ,

 ये बात अलग है कि पूरी दुनिया बसी है मेरी अन्धेरे में ।

अश्क भी बेपनाह बहा सकते हैं ,

जिन्दगी से परे हर इन्सान को पा सकते हैं ।

 झुठे लोगो के साये भी नज़र नहीं आते ,

कितना सच्चा है जीवन अन्धेरे में ।

क्या रिश्ता है अन्धेरे से मेरा ,

मैं तो दीप हूँ मेरा अस्त्तिव ही होता है उजागर अन्धेरे में ।

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4 Responses to “दीप और अन्धेरा”

  1. अच्छे भाव हैं, लिखते रहें. शुभकामनायें.

  2. divyabh said

    वैसे कविता का मूल दर्शन बहुत ही उम्दा है थोड़ी सी बीच का एक -दो लाईन छोड़ दिया जाए… गहरी संवेदना रखती हैं यह तो आपके प्रत्येक रचना से उद्घाटित होता ही है…
    और दीपक का महत्व भी तो अंधकार के बगैर कुछ भी नहीं…
    बहुत ही सुंदर…।

  3. मैं तो दीप हूँ मेरा अस्त्तिव ही होता है उजागर अन्धेरे में ।
    बहुत बड़ी सच्चाई है इस में।

  4. anita said

    wish ap hamesha likhte rahe or hame aisi hi or kavitao se pahchaan karwaye……

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