दीप और अन्धेरा
Posted by hemjyotsana "Deep" on September 28, 2007
शाम आखों में उठा के एक साया , अधुरा था अन्धेरे में ,
रोशनी जो की , छिप गया , इससे तो बहत्तर था अन्धेरे में ।
चलो आज़मां कर देख लें रोशनी को भी फिर से ,
रोशनी में भी देखें क्या मिलता है ,
ये बात अलग है कि पूरी दुनिया बसी है मेरी अन्धेरे में ।
अश्क भी बेपनाह बहा सकते हैं ,
जिन्दगी से परे हर इन्सान को पा सकते हैं ।
झुठे लोगो के साये भी नज़र नहीं आते ,
कितना सच्चा है जीवन अन्धेरे में ।
क्या रिश्ता है अन्धेरे से मेरा ,
मैं तो दीप हूँ मेरा अस्त्तिव ही होता है उजागर अन्धेरे में ।
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