चन्द शेर-2
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on सितम्बर 26, 2007
( १ )
राख में अब और क्या जलाने आये हैं ,
मेरे अपने मुझे फिर आजमाने आये हैं ।
( २ )
कुछ वक्त की मेहरबानी थी , कुछ हालात-ए-जिन्दगानी थी ,
ना जाने मैं कब और कैसे बड़ी हुई ,मुझ में भी नादानी थी ।
( ३ )
कुछ तोहफा-ए-खुदा था , कुछ अपनो ने दिया था ,
मेरा गम कैसे कहूँ बुरा था, बडे प्यार से मिला था।
( ४ )
भूल जाने से था बहत्तर, तेरा मुझसे रूठ जाना ,
जाना मुझसे दूर जाना , हाँ मगर लौट आना ।
( ५ )
उसका मेरा रिश्ता है ये ना जाने कैसा ,
सांसो की तरह उसका दिल में आना जाना ।
( ६ )
रात का मुसाफिर चदां , दिन को रूठ जाता है ,
तन्हाई में तो साथ देता है मैले में छुठ जाता है।
( ७ )
मैं परेशां हूँ मुझे परेशां ना करो , दोस्त मुझपे एहसान ना करो ,
लुट लो हर खुशी मेरी पर खुदा के लिये मेरा गम कम ना करो ।
( ८ )
वक्त क्यूँ इतना बेरहम निकला , ज़ख्म का मरहम दर्द का हम कदम निकला ,
दिल को तोडा जब मैंने अपने हाथ से , क्या कहूँ उसमें कितना ग़म निकला ।














दिनेश शुक्ल said
उसका मेरा रिश्ता है ये ना जाने कैसा ,
सांसो की तरह उसका दिल में आना जाना ।
बेहतर
prabhakar said
लाज़वाब
आज ही आपका शेऱ दिखा।
बहुत सही।
Prem Piyush said
सहज सरल भाषा में शेर । दूसरी वाली तो बहूत अच्छी लगी ।
समीर लाल said
शेर अच्छे लगे.
महावीर said
कुछ तोहफा-ए-खुदा था , कुछ अपनो ने दिया था ,
मेरा गम कैसे कहूँ बुरा था, बडे प्यार से मिला था।
सारे अशाअर ख़ूबसूरत हैंय़
jagat said
चन्द शेर-2
( दोस्ती, लम्हें जिन्दगी के)
( १ ) राख में अब और क्या जलाने आये हैं ,
मेरे अपने मुझे फिर आजमाने आये हैं ।
( २ ) कुछ वक्त की मेहरबानी थी , कुछ हालात-ए-जिन्दगानी थी ,
ना जाने मैं कब और कैसे बड़ी हुई ,मुझ में भी नादानी थी ।
( ३ )
कुछ तोहफा-ए-खुदा था , कुछ अपनो ने दिया था ,
मेरा गम कैसे कहूँ बुरा था, बडे प्यार से मिला था।
( ४ )
भूल जाने से था बहत्तर, तेरा मुझसे रूठ जाना ,
जाना मुझसे दूर जाना , हाँ मगर लौट आना ।
( ५ )
उसका मेरा रिश्ता है ये ना जाने कैसा ,
सांसो की तरह उसका दिल में आना जाना ।
( ६ )
रात का मुसाफिर चदां , दिन को रूठ जाता है ,
तन्हाई में तो साथ देता है मैले में छुठ जाता है।
( ७ )
मैं परेशां हूँ मुझे परेशां ना करो , दोस्त मुझपे एहसान ना करो ,
लुट लो हर खुशी मेरी पर खुदा के लिये मेरा गम कम ना करो ।
( ८ )
वक्त क्यूँ इतना बेरहम निकला , ज़ख्म का मरहम दर्द का हम कदम निकला ,
दिल को तोडा जब मैंने अपने हाथ से , क्या कहूँ उसमें कितना ग़म निकला ।