लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

जिन्दगी मौत और हम….

Posted by hemjyotsana "Deep" on September 20, 2007

दुनिया में क्या है तन्हा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है बेवजह ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है बिखरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है अपना ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है बुरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

दुनिया में क्या है उलझा ,
जिन्दगी मौत और हम ।

12 Responses to “जिन्दगी मौत और हम….”

  1. विनय प्रजापति Says:

    वह साहब…!!! सरल किन्तु उत्तम|

  2. अनिल रघुराज Says:

    जिंदगी, मौत और हम ही तो दुनिया हैं। बाकी जो है, जैसा है चलता है…हमारे वश में नहीं है

  3. neelima Says:

    सुन्दर कविता

  4. kanchan Says:

    वाह! बहुत खूब

  5. Sanjeet Tripathi Says:

    बढ़िया!!

  6. neerajdiwan Says:

    कम शब्दों में गंभीर रचना.. बधाई..

    आगे नए तेवर देखने मिलेंगे.. इसी उम्मीद के साथ मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें.

  7. समीर लाल Says:

    बढ़िया, लिखते रहें.

  8. mohinder Says:

    इस गजल में खास है क्या
    कम लफ़्ज, वजन और दम

  9. Annapurna Says:

    दुनिया में क्या है सच्चा
    ज़िन्दगी, मौत और हम

  10. AMARDEEP SINGH Says:

    BAHUT ACCHI SOCH AAPKI

  11. anand Says:

    zindagi..! maot..!! aor………HUM…….???

  12. rahul Says:

    maut ko bura mat kaha kariye plz

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