Archive for September, 2007
Posted by hemjyotsana "Deep" on September 29, 2007
मैं दो कदम चलता और एक पल को रुकता मगर………..
इस एक पल जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ जाती ।
मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और….
जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती ।
युँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और….
जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती ।
ये सिलसिला यहीं चलता रहता…..
फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पुछा……….
” तुम हार कर भी मुस्कुराते हो ! क्या तुम्हें दुख नहीं होता हार का ? “
तब मैंनें कहा…………….
मुझे पता हैं एक ऐसी सरहद आयेगी जहाँ से आगे
जिन्दगी चार कदम तो क्या एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी,
तब जिन्दगी मेरा इन्तज़ार करेगी और मैं……
तब भी युँ ही चलता रुकता अपनी रफ्तार से अपनी धुन मैं वहाँ पहुँगा…….
एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउगा……….
बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाँउगा।
ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउगा………
मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और अपनी जीत पर भी……
मगर जिन्दगी अपनी जीत पर भी ना मुस्कुरा पाई थी
और अपनी हार पर भी ना रो पायेगी ।
बस तभी मैं जिन्दगी को जिन्दगी जीना सीखा जाउँगा।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on September 28, 2007
शाम आखों में उठा के एक साया , अधुरा था अन्धेरे में ,
रोशनी जो की , छिप गया , इससे तो बहत्तर था अन्धेरे में ।
चलो आज़मां कर देख लें रोशनी को भी फिर से ,
रोशनी में भी देखें क्या मिलता है ,
ये बात अलग है कि पूरी दुनिया बसी है मेरी अन्धेरे में ।
अश्क भी बेपनाह बहा सकते हैं ,
जिन्दगी से परे हर इन्सान को पा सकते हैं ।
झुठे लोगो के साये भी नज़र नहीं आते ,
कितना सच्चा है जीवन अन्धेरे में ।
क्या रिश्ता है अन्धेरे से मेरा ,
मैं तो दीप हूँ मेरा अस्त्तिव ही होता है उजागर अन्धेरे में ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on September 26, 2007
( १ )
राख में अब और क्या जलाने आये हैं ,
मेरे अपने मुझे फिर आजमाने आये हैं ।
( २ )
कुछ वक्त की मेहरबानी थी , कुछ हालात-ए-जिन्दगानी थी ,
ना जाने मैं कब और कैसे बड़ी हुई ,मुझ में भी नादानी थी ।
( ३ )
कुछ तोहफा-ए-खुदा था , कुछ अपनो ने दिया था ,
मेरा गम कैसे कहूँ बुरा था, बडे प्यार से मिला था।
( ४ )
भूल जाने से था बहत्तर, तेरा मुझसे रूठ जाना ,
जाना मुझसे दूर जाना , हाँ मगर लौट आना ।
( ५ )
उसका मेरा रिश्ता है ये ना जाने कैसा ,
सांसो की तरह उसका दिल में आना जाना ।
( ६ )
रात का मुसाफिर चदां , दिन को रूठ जाता है ,
तन्हाई में तो साथ देता है मैले में छुठ जाता है।
( ७ )
मैं परेशां हूँ मुझे परेशां ना करो , दोस्त मुझपे एहसान ना करो ,
लुट लो हर खुशी मेरी पर खुदा के लिये मेरा गम कम ना करो ।
( ८ )
वक्त क्यूँ इतना बेरहम निकला , ज़ख्म का मरहम दर्द का हम कदम निकला ,
दिल को तोडा जब मैंने अपने हाथ से , क्या कहूँ उसमें कितना ग़म निकला ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on September 20, 2007
दुनिया में क्या है तन्हा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है बेवजह ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है बिखरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है अपना ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है बुरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है उलझा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on September 6, 2007
आओ मिलाउ मुझको तुम से ,
भीड़ में ना खो जाउ मैं ।
धूल उड़े और धूल में मिलकर ,
धूमिल ना हो जाउ मैं ।।
किससे क्या क्या मिला मुझको ,
किससे क्या क्या पाउ मैं ।
आज मैं कर लूँ सारी बातें ,
जो ना कभी कर पाउ मैं ।।
देर तलक से जाग रहा हूँ ,
नींद कहाँ से लाउ मैं ।
वक्त की आदत रही गुजरना ,
बीता हुआ वक्त कैसे लाउ मैं ।
इस दुनिया से मोह नहीं ,
पर छोड़ इसे क्यूँ जाउ मै ।
हर शहर से भागा नये शहर ,
पर खुद से भाग ना पाउ मैं ।
खोया मैंने कहूँ मैं कैसे ,
मेरा क्या जो खो पाउ मैं ।
मिट्टी का मैं पुतला हूँ बस ,
मिट्टी के सिवा क्या पाउ मैं ।
मिला प्रभु से दिया मुझे सब ,
ख़्वाब की चीजें कैसे लाउ मैं ।
पाकर जिसको चैन हो खोता ,
धन दौलत क्यूँ घर लाउ मैं ।
जो सुना मधुर-अमधुर ,
गीत बना कर गाउ मैं ।
चंचलता भूल चुका मन बेरागी ,
राग कहाँ से लाउ मैं ।
मैं अक्सर लड़ता खुद से ,
पर खुद से जीत ना पाउ मैं ।
एक बिन्दु मात्र हूँ काश ,
मिल मिल बिन्दु से खो जाउ मैं ।
मैं कहाँ हूँ उत्तम पर ,
क्यूँ उत्तम बन ना पाउ मैं ।
मेहनत मैं मरता हूँ नही ,
और उत्तम बनना चाहूँ मैं ।
ऐब पता है मेरे मुझको ,
दूर इन्हें कर ना पाउ मैं ।
मोह अन्धेरे से नहीं पर,
”दीप” कहाँ से जलाउ मैं ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on September 2, 2007
हर फ्रिक्र-ए-ज़हां को दिल से भुलाने चलो ।
चलो ख़्वाब में सूकून की नींद सोने चलो ।
खिज़ा में भी रंगो को याद रखना सदा ,
मौसम-ए-ग़म में भी , खुशी को पाने चलो ।
राहतों के शहर की तलाश में मर ना जाना ,
आफतों के जहां में ही , घर बसाने चलो ।
खिज़ा के बिन बहार कब आती है भला ,
बहार ना आये , तो खिज़ा को बुलाने चलो ।
ख़्वाहिश हो गर बुलन्द आंसमां छुने की ,
बादलो पर उड़ो , हवाओं को रिझाने चलो ।
मौसम-ए-तन्हाई में , ये दीप जलता रहे सदा,
यादों की रोशनी से , महफिल सजाने चलो ।
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