दोस्ती हो ही गई-गज़ल
Posted by Hem Jyotsana "Deep" on अगस्त 21, 2007
अदू अदू से ,अदू अदू से हमें दोस्ती हो ही गई ।
रोकते ही रहे, दिल में तू ,तू ही तू हो ही गई ।
समझ में आये हमारे , ये माँजरा ऐसा कहाँ ,
जुदा है तू , और समझ मेरी खो ही गई ।
रोज़ आता है चांद सितारों के साथ लेकिन ,
चांद को भी , दागो की आदत हो ही गई ।
तुझे तो शोक था मुझसे खफ़ा रहने का ,
मुझे भी आज तुझसे शिकायत हो ही गई ।
आज नहीं मैं तुझसे और कहुँगा कुछ ,
तुझे बरसों बाद देख ज़बा बेजुबां हो ही गई ।
अदू तो पास रहते है ,साथ रहते है ,याद तो करते है ,
तुम ना सम्भाल सके ,तुमसे यादें खो ही गई ।
मिलते ही रहे हम से कई बिछड़े हुऐ साथी ,
एक तू है , जो भीड़ में कहीं , खो ही गई ।
तुफान-ऐ-ग़म ने रोका बहुत हमें , मगर ,
खुदा की रहमत से दीप रोशन हो ही गई ।
अदू = दुश्मन














ranjana said
बहुत ख़ूब एक एक शेर दिल को छू गया
समझ में आये हमारे , ये माँजरा ऐसा कहाँ ,
जुदा है तू , और समझ मेरी खो ही गई ।
बहुत ख़ूब
महावीर said
बहुत ख़ूब!
पहले मिस्रे में लफ़्ज़ों का ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है।
लफ़्ज़ “उँदू” के बारे में कहना यह चाहूंगा कि यह उर्दू का लफ़्ज़ ‘उँदू’ ना होकर “अदू” है। शायद
अक्सर सुना होगा कि ‘दुश्मनी’ के लिए ‘अदावत’ शब्द इस्तेमाल होता है।
ग़ालिब का ये शेर देखिए जिसमें ‘अदू’ इस्तेमाल किया हैः
यही है आज़माना तो सताना किस जो कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहां कयूं हो
मैंने पक्का करने के लिए उर्दू की लुग़ात (डिक्शनरी) में भी देख लिया है।
सारे अशा’र बहुत पसंद आए। लिखती रहो।
महावीर said
ग़ालिब के शेर में मैंने दो ग़लतियां कर दी, ठीक कर दूं- ( को और क्यूं )
यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहां क्यूं हो
hemjyotsana parashar said
आदरणीय महावीर जी सर,
बहुत बहुत धन्यवाद ,
मैने आपकी comment के अनुसार उँदू को अदू कर दिया है ।
मैंने उर्दू की को तालीम नहीं ली है जितने शब्द सुने बस उन्ही को याद रख कर लिखने की कोशिश करती हूँ ।बचपन से ही जगजीत सिंह जी की गज़लें सुनी आ रही हूँ । उनकी ही एक गज़ल में अदू सुना पर सही तरीकें से लिखना नही आया ।
आशा है आप आगे भी इसी तरह मेरी कमियाँ बताते रहेगे ।
सादर
हेम ज्योत्स्ना
Prem Piyush said
सुंदर रचना है – पर थोड़ी दिक्कत जरूर हूई समझने में ।
और हाँ, महावीर जी की ऐसी टिप्पणी पढ़कर अंतिम पंक्तियों काफी सही लगती है ।
suruchi said
I think I m not eligible 4 comments
all sed song said
amrit_jaora
Annapurna said
अच्छा लिखती हो ।
nikhil nayak said
आप बहुत अच्छा लिखती है |
vicky said
i am Vicky Kumar Jain form tonk dist.and now i am interest in Hindi poem and present i am doing M.A.in Hindi
neel nakul varma said
अदू अदू से ,अदू अदू से हमें दोस्ती हो ही गई ।
रोकते ही रहे, दिल में तू ,तू ही तू हो ही गई ।
समझ में आये हमारे , ये माँजरा ऐसा कहाँ ,
जुदा है तू , और समझ मेरी खो ही गई ।
रोज़ आता है चांद सितारों के साथ लेकिन ,
चांद को भी , दागो की आदत हो ही गई ।
तुझे तो शोक था मुझसे खफ़ा रहने का ,
मुझे भी आज तुझसे शिकायत हो ही गई ।
आज नहीं मैं तुझसे और कहुँगा कुछ ,
तुझे बरसों बाद देख ज़बा बेजुबां हो ही गई ।
अदू तो पास रहते है ,साथ रहते है ,याद तो करते है ,
तुम ना सम्भाल सके ,तुमसे यादें खो ही गई ।
मिलते ही रहे हम से कई बिछड़े हुऐ साथी ,
एक तू है , जो भीड़ में कहीं , खो ही गई ।
तुफान-ऐ-ग़म ने रोका बहुत हमें , मगर ,
खुदा की रहमत से दीप रोशन हो ही गई ।
गुप्ता दीपक said
जगजीत जी की वह कौन सी गज़ल है, जिसमेँ उँदू शब्द का प्रयोग हुआ है
कृपया बताएँ
Hem Jyotsana "Deep" said
Ghazal hai Aahista Aahista…
sher hai …
Sawal-e-Wasal par unko adu ka khauf hai itna
dabe honthon se dete hai jawab aahista aahista
Neel Nakul varma said
हँसना है रोना है
जिन्दगी एक खिलौना है
टूटेगा यह एक दिन
माटी का यह भगोना है
कितने प्यार से बनाया
कुम्हार ने इसे
मगर है तो खिलौना है
रंग भरे चाहत के इसमें
खुब इसे पकाया
वक़्त से पहले टूटे ना
खुद टूट इसे बचाया
काहें का अभिमान
क्या अपना यहाँ समान
फिर साथ क्या ढोना है
टूटेगा यह एक दिन
जिन्दगी एक खिलौना है
भर भाव ठंडक के
शीतल बन भुझा प्यास
मुसाफिर है भगोना है
टूटना मुझे भी एक दिन
”पवन” भी तो खिलौना है
Neel Nakul varma said
कुछ दिन कुछ लम्हे
और साथ चलो
वह दिन दूर नही ,
अब हम भी चल देंगे
समझते है तेरी बेरुखी सनम
तेरी हर बात कों
और कितनो दिनों सच से अनजान बनेंगे
एक क़र्ज़ है तेरा मुझ पर कहीं मेरे जहन मे
खुदा करे तो वह क़र्ज़ भी उतार देंगे ….
वक़्त का आईना कैसे कहूँ झुटा है
हमे पता है किसी का एहसास क्या होता है
निभाना नहीं मुझे कुछ ऐसा
जहाँ एहसास बन ना छुता हो
मेरी दिल्लगी मेरी ही सही ….
खुद पर हँसता हूँ देख दीवानगी तेरे लिए …..
मुझे पता है आज में तेरा क्या होता हूँ—?
Neel Nakul varma said
+जीवन सोंन्द्र्य की आत्मा है और प्यार पूजा +++++++++
प्यार तो एक ऐसी सुखद अनुभूति है एक ऐसी मधुर सुगंध है जिसे प्रेमी -प्रेमिका कस्तूरी की भांति एक दुसरे के मन मे ढूंढते रहते है
प्यार
कोई स्पर्श्य या मूर्त वस्तु नही है यह तो केवल एक अनभूति या एहसास है एक
ऐसा एहसास जिस मे सिर्फ असीम आनंद प्राप्त होता है …वर्ना एक कसक सी भी
प्रेमी मन को व्याकुल किये रहती है और यह तो कितने रंग जिन्दगी की सच्चाई
के उजागर करती है
प्यार मे एक दुसरे को जानने और भावनाओं को समझने पढने की शमता होनी चाहिए
प्यार लेने की इच्छा मत रखे देने की यह एक इबादत है ईश्वर की ….
यह एक पवित्र बंधन है जिस मे एक दुसरे पर विस्वास समपर्ण और त्याग की भावना होनी चाहिए
वैसे भी प्यार का कोई अपना रूप नहीं होता वह तो सादे जल की तरह होता है जिस मे जैसा रंग डालो वह वैसा ही होता है
ठीक भावनाओ की तरह जिनका कोई रंग रूप नहीं होता उसे तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है
प्रेम भी एक ऐसा ही अहसास का नाम है जिस मे जिन्दगी की प्रेरणा छुपी होती है
प्यार एक उत्साह है
प्यार खुदा की इबादत है
प्यार खुद से खुद का मिलन है
प्यार जीवन की सोंद्रह्य की आत्मा है
प्यार दो रूह का मिलन है
एक प्यार की भाषा ही
बिन बोले बिन शब्दों के
आँखों से
और चेहरे की लालिमा से
दिल की धड़कनों से
बंया हो जाती है …
Neel Nakul varma said
जब आप किसी के चेहरे पर मुस्कान बन नहीं तेर सकते
तो किसी किसी के ह्रदय पर गम बन कर भी ना बेठे
किसी की आँखों मे से आँसू बन कर भी ना बहे
जब आपको किसी का एहसास ना हो तो उसे दोस्ती का नाम मत दे
रिश्ता कोई भी हो मगर दिल से जुडा ही अच्छा होता है ख़ुशी देता है
खून के रिश्ते खीचने समझ आते है ,जो रिश्ते खून के ना हो उन्हें बेमन खीचना उलझने पैदा करता है
कभी किसी की भावनाओं ,जज्बातों ,से कोई खेल ना खेले ..यह आपको शोभा ना देगा
हर रोज़ कुछ पल अपने अस्तिव कों जरुर दे …सोचे क्या है आप क्या अच्छा कर सकते है
कौन सी बुराई .कुंठाए निकाल फ़ेंक सकते है
बाहरी स्नान से जरुरी मन के स्नान की जरूरत बनाये ..जिससे उसमे चिपकी सारी मेल उतर जाये
हमेशा
याद रखे जो बोया है उसे हमने ही काटना है ..भूले मत ..सबसे बड़ी पूजा आप
का ह्रदय कों किसी के प्रति उसकी ख़ुशी कों देख खुश रहना ही है किसी का
दर्द बाँटना ही आपके कर्मो की जमा पूंजी है जो आपका जीवन सार्थक करता है
Neel Nakul varma said
सपना नही हकीकत दे जायेंगे चलके नई दिशाओं में
नई राह पे नई मंजिल बनायेंगे नया न समझना
बेशक हम नये हैं कुछ नया ही दे जायेंगे
होगी न कोई बंदिशें
न हिन्दू सिक्ख इसाई न मुसलमान जहाँ
न है कोई ऐसा जहाँ यहाँ
चलके नई दिशाओं पे
नई राह पे नया देश बनायेंगे
ठोकर न दे कंकड़ समझ कर
गर टूट के बिखर गये तिनके की तरह
टूट के भी तेरे घर की दीवार बनायेंगे
नया न समझना बेसक हम नये हैं| कुछ नया ही देजायेंगे
चल के नई दिशा में नई राह में नई मंजिल बनायेंगे
होगा आतंक कहा जब होंगे ही नही आतंकवादी
हर किसी को मिल ही जाएगी
अपने अपने हिस्से की आज़ादी
न तीर से न तलवार से न गोलियों की बौछार से
मिट जायेंगे ये बंदे अपने ही विचार से
चलके नई राह पे नई दिशाओं से
कुछ ऐसा धुंध लायेंगे नया न समझना
बेशक हम नये हैं कुछ नया ही देजाएंगे
एक एक शब्द कबीर से मांग कर लायेंगे
चल उस देश में वायु को फिर से हम पायेंगे
कली से फूल बनगए अब रोकोगे कैसे
अपनी एक एक ख़ुशी अपने देश में बिखर जायेंगे
नया न समझना बेशक हम नये हैं कुछ नया ही देजायेंगे
चलके नई दिशाओ पे नई मंजिल बनायेंगे
सपना नही हकीकत दे जायेंगे
चलके नई दिशाओ में नई राह पे नई मंजिल बनायेंगे…neel
Neel Nakul varma said
हर चहरे मे कुछ तोह एह्साह है,
आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,
क्या करे हमारी पसंद ही कुछ “ख़ास” है.
चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तोह चाँद की चाहत किसे होती.
कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.
कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,
जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.
दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है
दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है.
दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.
दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,
इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,
यह वो “अनमोल” मोटी है जो बिकता नही.
सची है दोस्ती आजमा के देखो.
करके यकीं मुझपर मेरे पास आके देखो,
बदलता नही कभी सोना अपना रंग,
चाहे जितनी बार आग मे जला के देख………..Neel ███
Neel Nakul varma said
जिंदगी गुजर रही है खुशी की तलाश में,
रोते हुए दिल के लिए हंसी की तलाश में,
वक्त ने इस दिल को कई जख्म दिये,
इन जख्मों के लिए मरहम की तलाश में,
खामोशियां इस दिल का हिस्सा बन गई,
दो पल के लिए मुस्कुराहट की तलाश में,
अपनी मंजिल तक भूल चुका हूं,
उस के प्यार की तलाश में,
चाहतों की दुनिया में गम के सिवा कुछ नहीं,
पल-पल गुजर रहा हूं खुशी की तलाश में,
मेरे दिल इतना बता मुझे,
क्यूं तड़प रहा है तु उसी की तलाश में।
Neel Nakul varma said
वाणी की शक्ति बहुत बड़ी है. अच्छे परामर्श देकर हम दूसरों का इतना भला कर
सकते हैं जितना कि धन का पिटारा देने पर भी संभव नहीं. ऐसे परामर्श देने के
लिए अथवा आत्म चिंतन करने के लिए वाणी को, विचारों को तीन कसौटियों पर
कसना चाहिए. वे सत्य के निकट है अथवा नहीं ? कल्याणकारी है अथवा नहीं ? और
उसमें अपनी और दूसरों की भलाई समाहित है या नहीं ? अविवेक पूर्ण कुछ भी
सोचते रहना उचित भी नहीं. हमारी वाणी दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने वाली हो
तभी उसकी गरिमा है .ऐसे परामर्शों में यह देखते रहना चाहिए कि कौन कितना
पचा सकता है. जिसे सामने वाला हजम न कर सके और अपमान समझ कर उल्टा विद्रोही
बन चले , ऐसा परामर्श न दें. सत्परामर्श देने के लिए अति उपयुक्त अवसर की
प्रतीक्षा करनी चाहिए…………
Neel Nakul varma said
प्रियतम मेरे
प्रियतम मेरे, प्रियतम मेरे !
क्यों तोड़ा ये आईना मेरे प्रीत का ,
आखिर मैंने तेरा क्या बिगाड़ा ?
क्यों पहुँचायी ठेस तुने मेरे विश्वास को
क्यों किया घायल मेरे मन को ?
क्यों बुझाया दीया तूने मेरे प्रेम का ?
जिसमें वर्षों से जल रही थी रौशनी,
अपने प्रीत की आशा और विश्वास की ……
जिसमें सँवारी थी मैंने बड़े जतन से एक तस्वीर,
जो प्रतीक थी मेरे निश्छल और पवित्र प्रेम-साधना की …..
बोलो प्रियतम कुछ तो बोलो ?
आखिर मैंने था तेरा क्या बिगाड़ा ?
प्रियतम मेरे, प्रियतम मेरे ,
हो कितने अभिमानी तुम
और कितनी निष्ठुरता तुझमें,
हो कितने निर्मोही तुम |
आखिर क्यों बुझाया वो दीपक ,
जिसमें छुपी थी असीम श्रद्धा की रौशनी;
जो थी पहचान अपनी प्रतिष्ठा के गरिमा की ,
और थी मिसाल अपने प्रणय की आग की |
किया था अपने ‘ह्रदय का सारा प्यार ‘
निछावर तुम्हीं पे तो हमने ,
हाँ, अगर कहो ‘स्नेह’ दिया औरों को भी, तो अभी मान लूँ
इस हार जीत के झूठ-मूठ से विश्राम अभी ले लूँ |
पर बोलो प्रियतम,क्यों किया तिरस्कार
तुमने अपनी ही प्रीत का ?
क्या इसमें भी कोई मकसद,
किसी हार या जीत का ?
बोलो प्रियतम अब तो बोलो ,
भेद ये मन का कुछ तो खोलो ..
नयनों के इस थाल में,
जिसमें भरा था सिर्फ प्यार ही प्यार,
अब है बस दर्द ही दर्द!
फिर भी ये आँखें करती क्यों तुम्हारी ही कद्र?
ये प्रीत की डोरी बन जाए न कहीं सिरदर्द !
माना कि जुल्म ही ढाए थे तुमपे मैंने भी,
क्यूँ कि दुःख और क्रोध का जब उमड़ा था सैलाब,
तो ये यंत्रणा सहन नहीं कर पायी थी मैं !
खुद को उत्तेजना से नहीं बचा सकी थी मैं ;
पर तुमने भी तो कोई कसर नहीं छोड़ी,
और टूटती गयी हमारी प्रेम की डोरी…
सो बोलो प्रियतम ,अब तो बोलो
मन का भेद भेद ही रखो ,पर किसी भी धर्म के मूल तत्त्व उस
धर्म को मानने वालों के विचार, मान्यताएँ, आचार तथा संसार एवं लोगों के
प्रति उनके दृष्टिकोण को ढालते हैं।
1. ब्रह्म ही सत्य है: ईश्वर एक ही है और वही प्रार्थनीय तथा पूजनीय है।
वही सृष्टा है वही सृष्टि भी। शिव, राम, कृष्ण आदि सभी उस ईश्वर के संदेश
वाहक है। हजारों देवी-देवता उसी एक के प्रति नमन हैं। वेद, वेदांत और
उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं।
2. वेद ही धर्म ग्रंथ है : कितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने
पुराणों की कथाएँ जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार
पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ
नहीं इतिहास ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य
वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है वही सनातन
धर्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है।
3. सृष्टि उत्पत्ति व प्रलय : सनातन हिन्दू धर्म की मान्यता है कि सृष्टि
उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में कहा गया
है कि जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान हो
जाता है और जैसे ही रात होने लगती है, सब कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो
जाता है। वह सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्वों से मिलकर बनी है। परमेश्वर सबसे
बढ़कर है।
4. कर्मवान बनो : सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता
है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं कार्य-कारण के
सिद्धांत अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं
ही उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से
अपनी नियति स्वयं तय करता है। इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म का विवेचन
वेद और गीता में दिया गया है।
5. पुनर्जन्म : सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। जन्म
एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की प्रक्रिया से गुजरती हुई आत्मा अपने
पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। आत्मा के मोक्ष प्राप्त
करने से ही यह चक्र समाप्त होता है।
6. प्रकति की प्रार्थना : वेद प्राकृतिक तत्वों की प्रार्थना किए जाने के
रहस्य को बताते हैं। ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल, अग्नि, जल, वायु, आकाश
और हरे-भरे प्यारे वृक्ष हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं अत: इनके
प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे जीवन को समृद्ध कर हमें सद्गति प्रदान करते
हैं। इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। यह ईश्वर और हमारे बीच सेतु का
कार्य करते हैं। यही दुख मिटाकर सुख का सृजन करते हैं।
7.गुरु का महत्व : सनातन धर्म में सद्*गुरु के समक्ष वेद शिक्षा-दिक्षा
लेने का महत्व है। किसी भी सनातनी के लिए एक गुरु (आध्यात्मिक शिक्षक) का
मार्ग दर्शन आवश्यक है। गुरु की शरण में गए बिना अध्यात्म व जीवन के मार्ग
पर आगे बढ़ना असंभव है। लेकिन वेद यह भी कहते हैं कि अपना मार्ग स्वयं
चुनों। जो हिम्मतवर है वही अकेले चलने की ताकत रखते हैं।
8.सर्वधर्म समभाव : ‘आनो भद्रा कृत्वा यान्तु विश्वतः’- ऋग्वेद के इस
मंत्र का अर्थ है कि किसी भी सदविचार को अपनी तरफ किसी भी दिशा से आने
दें। ये विचार सनातन धर्म एवं धर्मनिष्ठ साधक के सच्चे व्यवहार को दर्शाते
हैं। चाहे वे विचार किसी भी व्यक्ति, समाज, धर्म या सम्प्रदाय से हो। यही
सर्वधर्म समभाव: है। हिंदू धर्म का प्रत्येक साधक या आमजन सभी धर्मों के
सारे साधु एवं संतों को समान आदर देता है।……………
Neel Nakul varma said
क्या बताये आपसे हम हाथ मलते रह गए
गीत सूखे पर लिखे थे, बाढ़ में सब बह गए
भूख, महगाई, गरीबी इश्क मुझसे कर रहीं थीं
एक होती तो निभाता, तीनो मुझपर मर रही थीं
मच्छर, खटमल और चूहे घर मेरे मेहमान थे
मैं भी भूखा और भूखे ये मेरे भगवान् थे
रात को कुछ चोर आए, सोचकर चकरा गए
हर तरफ़ चूहे ही चूहे, देखकर घबरा गए
कुछ नहीं जब मिल सका तो भाव में बहने लगे
और चूहों की तरह ही दुम दबा भगने लगे
हमने तब लाईट जलाई, डायरी ले पिल पड़े
चार कविता, पाँच मुक्तक, गीत दस हमने पढे
चोर क्या करते बेचारे उनको भी सुनने पड़े
रो रहे थे चोर सारे, भाव में बहने लगे
एक सौ का नोट देकर इस तरह कहने लगे
कवि है तू करुण-रस का, हम जो पहले जान जाते
सच बतायें दुम दबाकर दूर से ही भाग जाते
अतिथि को कविता सुनाना, ये भयंकर पाप है
हम तो केवल चोर हैं, तू डाकुओं का बाप है
Neel Nakul varma said
जिनकी भुजाओं की शिराएँ फडकी ही नहीं,
जिनके लहु में नहीं वेग है अनल का.
शिव का पदोदक ही पेय जिनका है रहा,
चक्खा ही जिन्होनें नहीं स्वाद हलाहल का.
जिनके हृदय में कभी आग सुलगी ही नहीं,
ठेस लगते ही अहंकार नहीं छलका.
जिनको सहारा नहीं भुज के प्रताप का है,
बैठते भरोसा किए वे ही आत्मबल का.
उसकी सहिष्णुता क्षमा का है महत्व ही क्या,
करना ही आता नहीं जिसको प्रहार है.
करुणा, क्षमा को छोड़ और क्या उपाय उसे,
ले न सकता जो बैरियों से प्रतिकार है?
सहता प्रहार कोई विवश कदर्य जीव,
जिसके नसों में नहीं पौरुष की धार है.
करुणा, क्षमा है क्लीब जाति के कलंक घोर,
क्षमता क्षमा की शूर वीरों का सृंगार है.
प्रतिशोध से है होती शौर्य की शीखाएँ दीप्त,
प्रतिशोध-हीनता नरो में महपाप है.
छोड़ प्रतिवैर पीते मूक अपमान वे ही,
जिनमें न शेष शूरता का वह्नि-ताप है.
चोट खा सहिष्णु व’ रहेगा किस भाँति, तीर
जिसके निषग में, करों में धृड चाप है.
जेता के विभूषण सहिष्णुता, क्षमा है पर,
हारी हुई जाति की सहिष्णुताSभिशाप है.
सटता कहीं भी एक तृण जो शरीर से तो,
उठता कराल हो फणीश फुफकर है.
सुनता गजेंद्र की चिंघार जो वनों में कहीं,
भरता गुहा में ही मृगेंद्र हुहुकार है.
शूल चुभते हैं, छूते आग है जलाती, भू को
लीलने को देखो गर्जमान पारावार है.
जग में प्रदीप्त है इसी का तेज, प्रतिशोध
जड़-चेतनों का जन्मसिद्ध अधिकार है.
सेना साज हीन है परस्व-हरने की वृत्ति,
लोभ की लड़ाई क्षात्र-धर्म के विरुद्ध है.
वासना-विषय से नहीं पुण्य-उद्भूत होता,
वाणिज के हाथ की कृपाण ही अशुद्ध है.
चोट खा परन्तु जब सिंह उठता है जाग,
उठता कराल प्रतिशोध हो प्रबुद्ध है.
पुण्य खिलता है चंद्र-हास की विभा में तब,
पौरुष की जागृति कहाती धर्म-युद्ध है.
धर्म है हुताशन का धधक उठे तुरंत,
कोई क्यों प्रचंड वेग वायु को बुलाता है?
फूटेंगे कराल ज्वालामुखियों के कंठ, ध्रुव
आनन पर बैठ विश्व धूम क्यों मचाता है?
फूँक से जलाएगी अवश्य जगति को ब्याल,
कोई क्यों खरोंच मार उसको जगाता है?
विद्युत खगोल से अवश्य ही गिरेगी, कोई
दीप्त अभिमान पे क्यों ठोकर लगाता है?
युद्ध को बुलाता है अनीति-ध्वजधारी या कि
Neel Nakul varma said
भगतसिंह! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फाँसी की !
यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे–
बम्ब-सम्ब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; ज़रूरत क्या वारंट तलाशी की !
मत समझो, पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से,
रुत ऎसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से,
कामनवैल्थ कुटुम्ब देश को खींच रहा है मंतर से–
प्रेम विभोर हुए नेतागण, नीरा बरसी अंबर से,
भोगी हुए वियोगी, दुनिया बदल गई बनवासी की !
गढ़वाली जिसने अंग्रेज़ी शासन से विद्रोह किया,
महाक्रान्ति के दूत जिन्होंने नहीं जान का मोह किया,
अब भी जेलों में सड़ते हैं, न्यू-माडल आज़ादी है,
बैठ गए हैं काले, पर गोरे ज़ुल्मों की गादी है,
वही रीति है, वही नीति है, गोरे सत्यानाशी की !
सत्य अहिंसा का शासन है, राम-राज्य फिर आया है,
भेड़-भेड़िये एक घाट हैं, सब ईश्वर की माया है !
दुश्मन ही जब अपना, टीपू जैसों का क्या करना है ?
शान्ति सुरक्षा की ख़ातिर हर हिम्मतवर से डरना है !
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झाँसी की !
Neel Nakul varma said
मैं तुम पर आश्रित नहीं
स्वयं सिद्धा हूँ
तुम्हारे स्नेह को
पाकर
ना जाने क्यों
कमजोर हो जाती हूँ
स्वयं को बहुत असहाय
पाती हूँ
शायद इसलिए
तुम्हारे हर स्पर्ष में
प्रेम की अनुभूति
होती है
उस प्रेम को पाकर
मैं मालामाल हो जाती हूँ
और अपनी उस
दौलत पर
फूली नहीं समाती हूँ
अपनी इच्छा से
अपने को
पराश्रित
और बंदी बना लेती हूँ
किन्तु तुम्हारा अहंकार
बढ़ते
ही
मेरी जंजीरें स्वयं
टूटने लगती हैं
मेरी खोई हुई
शक्ति
पुनः लौट आती है
और मैं आत्म विश्वास से भर
हुँकारने
लगती हूँ
मेरी कोमलता
मेरी दुर्बलता नहीं
मेरा श्रृंगार
है……………neel
Neel Nakul varma said
दोस्ती ईश्वर की अनुपम देन.
इससेदुनिया के तमाम खूबसूरत रिश्तों में से एक
रिश्ता दोस्ती का है।
दोस्त स्ट्रीटलाइट की तरह होते हैं, वे हमारे जीवन की राह
में रोशनी भर
देते हैं। हमारा सफर सहज हो जाता है।
एक सही और अच्छा दोस्त
हमारी जिंदगी बदलने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाता है।
जरूरी नहीं कि आपके दोस्त
अपने सामाजिक दायरे से ही हों। कई बार भगवान उन्हें अलग-अलग रूपों में भेजता
है
पशु-पक्षी भी आपके दोस्त हो सकते हैं या कई बार अचानक ऎसे व्यक्ति मिल जाते
हैं जो खुद भी एक ईमानदार दोस्त की तलाश में होते हैं।
जिंदगी में खुश रहने के
लिए सिर्फ रूपयों का ढेर, बडे महल, महंगी गाडियां, ऊंचा पद ही खुश रहने के लिए काफी
नहीं है। ये सब चिजें कुछ पल का सुख देती हैं। लेकिन दोस्त हमेशा हमारी खुशी को
बनाए रखने का काम करता है।
दोस्त हमें जीवन में कुछ अच्छा देते हैं। जीवन की
बैटरी को चार्ज करने के लिए दोस्ती की जरूरत होती है।
एक अच्छा और सच्चा दोस्त
वह होता हे जो आपकी राहों में आई मुश्किलों का हल निकालते हैं।
एक सच्चा दोस्त
वह है जो आपके दिल की बात को समझ पाए ओर आपका संबल बढाकर आपको सही रास्ता दिखाए।
अच्छे दोस्त को कैसे ढूंढा जाए या कैसे पहचाना जाए। दोस्ती की कोई सीमा या
मापदंड नहीं होता।
अच्छा दोस्त पाने के लिए आप अपने मिलने-जुलने वालों में से
उन पर गौर करें, जिनसे आप सहज रूप से बात कर पाते हों।
जिनकी बातों पर आपको हंसी
आती हो या आपके परेशान होने पर उनका भी मन उदास हो जाता हो।
जरूरी नहीं कि आपका
दोस्त आपका हमउम्र हो या आपके स्टेटस का हो या आप दोनों का धर्म या भाषा एक हो।
दोस्ती कभी भी किसी से भी हो सकती है। ऑफिस में आपकी सीट के पास बैठने वाला
सहकर्मी भी आपका दोस्त हो सकता है।
वॉक पर रोजाना मिलने वाले दादाजी या कोई
बुजुर्ग, नियमित रूप से आपका चैकअप करने वाला आपका डॉक्टर या पडौस में रहने वाली
बुजुर्ग आंटी कोई भी आपका दोस्त हो सकता है। लेकिन इस दोस्ती को लंबे समय तक बनाए
रखने के लिए आपसी प्रेम और विश्वास होना बहुत जरूरी है।
अच्छे दोस्त आपके जीवन
को सार्थक बनाते हैं। सकारात्मक ऊर्जा के साथ वे आपको जीवन जीने का हौंसला देते हैं।
जब जिंदगी के रास्ते बंद हो जात………….
Neel Nakul varma said
अपने क्रोध को समझें
तर्क गुस्से को कम करता है, क्योंकि
गुस्सा जब जायज होता है तभी आपे से बाहर हो जाता है। अत: गुस्से की अवस्था में
स्वयं से तर्क करें। स्वयं को याद दिलायें कि ” सारी दुनिया आपके हिसाब से नहीं चल
सकती। आप बस रोजमर्रा की जिन्दगी के कुछ कठिन हिस्सों के रू ब रू हो रहे हैं।” यह
हमेशा अपने आपको याद दिलाएं, यह गुस्से के कोहरे में से आपके अपने स्व की पहचान के
लिये आवश्यक है। इससे आपके विचार संतुलित होंगे।क्रोधित व्यक्तियों की मांग होती
है: न्याय, सराहना, सहमति और अपना मनवांछित करने की इच्छा। हर कोई यह सब चाहता है,
हम सब आहत होते हैं जब हमें यह सब नहीं मिलता, पर क्रोधित व्यक्ति इन चीजों की
अपेक्षा करता है जो कि इस विपरीत लोगों से भरी दुनिया में संभव नहीं, ऐसे में उनकी
असंतुष्टी क्रोध में बदल जाती है।
हम सभी जानते हैं कि क्रोध क्या है, हम
सभी इसे महसूस भी करते हैं। चाहे वह सतही नाराजग़ी हो या पूरा उफनता हुआ गुस्सा।
क्रोध एक आम, स्वस्थ मनोभाव है, किन्तु जब यह हमारे बस के बाहर हो जाता है तब यह
विनाशकारी हो जाता है, इससे समस्याएं जन्म लेती हैं, चाहे वे समस्याएं कार्यक्षेत्र
में हों या व्यक्तिगत सम्बंधों में, यह जीवन को हर तरह से प्रभावित करता है। और हम
महसूस करते हैं कि हम किसी अनजाने शक्तिशाली मनोभाव के दास मात्र होकर रह गये हैं।
यह आलेख आपके लिये क्रोध को जानने और इस पर सयंम रखने की दिशा में एक सहायक प्रयास
साबित हो सकता है।
Neel Nakul varma said
वन्देमातरम! वन्देमातरम!!
सुजलाम सुफलाम मलयजशीतलाम
शस्यश्यामलाम मातरम |
वन्देमातरम ||१||
शुभ्रज्योत्सनापुलकितयामिनीम
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनिम
सुहासीनीमसुमधुरभाषिणीम
सुखदाम वरदाम मातरम |
वन्देमातरम ||२||
कोटि-कोटि कंठ कलकल निनाद कराले
कोटि-कोटि भुजैधृत खरकरवाले
अबला केनो माँ एतो बले
बहुबलधारिणीम नमामि तारिणीम
रिपुदलवारिणीम मातरम |
वन्देमातरम ||३||
तुमि विद्या तुमि धर्म
तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं ही प्राण: शरीरे
बाहू ते तुमि माँ शक्ति
ह्रदये तुमि माँ भक्ति
तोमारइ प्रतिमा गडि मंदिरे मंदिरे |
वन्देमातरम ||४||
त्वं ही दुर्गा दशप्रहरणधारिणीं
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायनीम
नमामि त्वां, नमामि कमलाम
अमलाम, अतुलाम
सुजलाम, सुफलाम, मातरम |
वन्देमातरम ||५||
श्यामलाम, सरलाम, सुषिमताम, भूषिताम
धरणीम, भरणीम,मातरम |
वन्देमातरम ||६||
Neel Nakul varma said
मुझे आवाज उठाने दो,
हाशिये से अब तो मुझे
मुख्य पटल पे आने दो।
कब तक आँसू पीती रहूँ
अब तो उसे बहाने दो।
अबला बनकर बहुत अत्याचार सहा,
अब तो बला बन जाने दो।
कितनी अग्निपरीक्षायें लोगे मेरी
कभी मुझे भी तो आजमाने दो।
आधी आबादी की पूरी हकीकत
अब दुनिया को बतलाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
आरक्षण से मुझे मत दबाओ
खुद अपनी जगह बनाने दो,
हमें भी हक़ है आजादी का
समाज के बँधन से मुक्त हो जाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
ज्योति बन कर कब तक फूँक सहूँ
अब तो ज्वाला बन जाने दो।
सीता सावित्री बहुत हुआ
अब तो काली कहलाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
पुरूषों की पाशविकता से
अब तो पिंड छुड़ाने दो।
नीची नजरों से बहुत ज़ुल्म सहा
अब दुनिया से नज़र मिलाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
चाहरदीवारी भी अब सुरक्षित नहीं
उससे बाहर आ जाने दो,
सुनती रही अब तक आज्ञा
अब तो आदेश सुनाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
आजादी के सपने को
हमें भी साकार बनाने दो,
वीरों के बलिदानों को
हमें भी भुनाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
कुछ नहीं कर सकते तो
इतना कर दो,
माँ की कोख से कम से कम
बाहर तो आ जाने दो।
मुझे आवाज उठाने दो…..
Neel Nakul varma said
अब आने वाला चुनाव है
—————————–
मरे हुए सपनो को फिर से,
जीवन दिलवाने के खातिर
सपनो का संसार दिखा कर,
फिर से बहलाने के खातिर
पांच साल में,एक बार जो,
मिलकर यज्ञ किया जाता है
राजनीती के इस खेले को,
नाम चुनाव दिया जाता है
इक दूजे को ‘स्वाह ‘स्वाह’ कर,
‘इदं न मम’ की बातें करते
बार बार इस आयोजन में,
मन्त्र न,झूंठे वादे पढ़ते
मन में भर कर भाव कलुषित,
फैलाते ये घना धुंवां है
मार पीट और खूनखराबा,
अक्सर कितनी बार हुआ है
समिधा बना खरचते पैसा,
आहुति होती धन और बल की
संचित धन हो जाए कई गुना,
इसी मधुर आशा में कल की
बाहुबली, दबंग सभी तो,
सत्ता सुख का सपना पाले
उजले वसन पहन कर दिखते,
बगुला भगत बने ये सारे
पदासीन फिर सत्ता पाने,
एडी चोंटी जोर लगाते
बढ़ा दाम,फिर सस्ता करते,
घटा रहे मंहगाई ,बताते
अच्छा ,भला,बुरा क्या छांटे,
जिसको देखो वो है नंगा
डुबकी सभी लगाना चाहें,
बहती है सत्ता की गंगा
कोशिश टिकिट जाय मिल सबको,
बीबी ,बेटा,साला,भाई
वंशवाद फैले और विकसे,
पांच साल तक करें कमाई
भ्रष्टाचार मिटा देंगे हम,
और विकास का वादा करते
सर्व प्रथम खुद का विकास कर,
अपनी अपनी झोली भरते
एक बार मिल जाए सत्ता,
जीवन में आ जाय उजाला
फेंट रहे सब अपने पत्ते,
अब चुनाव है आनेवाला
Neel Nakul varma said
नौजवान आओ रे, देश को बचाओ रे
देश में गुलामी है,
बीरो से ये खाली है ।
राजतंत्र किधर गया,
लोकतंत्र भी डर गया
नहीं इसमें जान रे, क्या से क्या ये कर गया।
लोकतंत्र मायावी
है, भष्ट्राचार हावी है
अब कोई नेता न रहे, जो आजाद हिन्द कर सके
।
गांधी,
सुभाष, वीरों को, अब करो तुम याद रे,
नौजवान आओ रे, देश
को बचाओ रे ।
चित्कार कर रही, माॅं भारती पुकार रही
चारो ओर अंधकार है,
कहीं न बचा प्रकाश है।
नौकरी के नाम पर, लूट भ्रष्ट्राचार है
किसान भी लाचार
है, टेक्स की भरमार है ।
गंगा आज मैली है,
इसमें भी गंदगी फैली है
हवा भी शुद्ध न रही, इसमें भी जहर फैली है ।
भोजन भी आज खराब
है, रसायनों की भरमार है ।
मन भी आज मैला है, अब तो इसे सुधार लो ।
नशे से आज हो
रही, सब सर्वनाश रे,
नौजवानों आओ रे,
देश को बचाओं रे ।
देश की संस्कृति, अब हो रही गुलाम रे,
नौजवान आओ रे देश
को बचाओ रे।
ईस्ट इंडिया कं. व्यापार ले के आयी थी,
कर गई कंगाल वो,
देश की दरबार को
5000 कम्पनी अब लूट
रही है देश को
विदेशी भाषा बन रही, देश में आज महान रे ।
अब तो इसे उखाड़
दो, अंग्रेजो की ये शान रे
नौजवान आओ रे, देश को बचाओं रे ।
स्वास्थ तो दूर
गया, अब सभी बीमारी रे
योग से बचालो अब,
सारे संसार रे,।
भ्रष्ट राजनीति के आज सभी गुलाब रे ,
नौजवान आओ रे, देश
को बचाओ रे ।
एक चिन्गारी फूट पड़ी, रामदेव नाम है
स्वाभिमान को जगाने
आ गया जहान में ।
रोके से ये रूके
नहीं, किसी से ये झुके नहीं
साथ अब हो जाओ रे देश को बचाओ रे ।
अब तो सीना तान
लो, सर में कफन बांध लो,
भय भूख गरीबी से, देश को उबार लो ।
अब तो तुम न सोओ रे
जाग भी अब जाओ रे
नौजवान आओ रे, देश
को बचाओं रे ।
नौजवान आओ रे, नौजवान आओ रे ।
देश को बचाओ रे देश
को बचाओ ।।
Neel Nakul varma said
कब तक यूं खूनी दलदल में, धंसा रहेगा मनुज समाज
कब तक औरत को रौंदेगा, ये दहेज का कुटिल रिवाज
कब तक इस समाज में अंधी, रीत चलाई जाएगी
कब तक नारी यूं दहेज की, बली चढाई जाएगी
नारी पूजा, नारी करुणा, नारी ममता, नारी ज्ञान
नारी आदर्शों का बंधन, नारी रूप रंग रस खान
नारी ही आभा समाज की, नारी ही युग का अभिमान
वर्षों से वर्णित ग्रंथों में, नारी की महिमा का गान
नारी ने ही प्यार लुटाया, दिया सभी को नूतन ज्ञान
लेकिन इस दानव दहेज ने, छीना नारी का सम्मान
उसके मीठे सपनों पर ही, हर पल हुआ तुषारापात
आदर्षों पर चलती अबला, झेले कदम कदम आघात
चीखें उठती उठकर घुटती, उनका क्रंदन होता मौन
मूक बना है मानव, नारी का अस्तित्व बचाए कौन
कब तक वो यूं अबला बनकर, चीखेगी चिल्लाएगी
कब तक नारी यूं दहेज की, बली चढ़ाई जाएगी
इस समाज में अब लडकी का, बोझ हुआ देखो जीवन
नहीं जन्म पर खुशी मनाते, होता नहीं मृत्यु का गम
एक रीति यदि हो कुरीति, तो सब फैलें फिर अपने आप
इस दहेज से ही जन्मा है, आज भ्रूण हत्या सा पाप
वो घर आंगन को महकाती, रचती सपनों का संसार
पर निष्ठुर समाज नें उसको, दिया जन्म से पहले मार
कोई पूछो उनसे जाकर, कैसे वंश चलाएंगे
जब लडकी ही नहीं रहेंगी, बहू कहां से लाएंगे
लडकों पर बरसी हैं खुशियां, लडकी पर क्यूं हुआ विलाप
प्रेम और करुणा की मूरत, बन बैठी देखो अभिशाप
कब तक उसके अरमानों की, चिता जलाई जाएगी
कब तक नारी यूं दहेज की, बली चढाई जाएगी
इस दहेज के दावनल में, झुलसे हैं कितने श्रृंगार
कितनी लाशें दफन हुई हैं, कितने उजड़े हैं संसार
स्वार्थों के खूनी दलदल हैं, नैतिकता भी लाशा बनी
पीड़ित शोषित और सिसकती, नारी टूटी स्वास बनी
धन लोलुपता सुरसा मुख सी, बढती ही जाती प्रतिक्षण
ये सचमुच ही है समाज के, आदर्षों का चीरहरण
खुलेआम लेना दहेज, ये चलन हुआ व्यापारों सा
अब विवाह का पावन मंडप, लगता है बाजारों सा
इस समाज का यह झूठा, वि”वास बदलना ही होगा
हम सब को आगे आकर, इतिहास बदलना ही होगा
कब तक अदभुत यह कुरीती, मानवता को तडपाएगी
कब तक नारी यूं दहेज की बली चढ़ाई जाएगी
Neel Nakul varma said
हैफ हम जिसपे की तैयार थे मर जाने को
जीते जी हमने छुड़ाया उसी कशाने को
क्या ना था और बहाना कोई तडपाने को
आसमां क्या यही बाकी था सितम ढाने को
लाके गुरबत में जो रखा हमें तरसाने को
फिर ना गुलशन में हमें लायेगा शायद कभी
याद आयेगा किसे ये दिल-ऐ-नाशाद कभी
क्यों सुनेगा तु हमारी कोई फरियाद कभी
हम भी इस बाग में थे कैद से आजाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को
दिल फिदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहाँ देखिए घर करते हैं
खुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को
ना मयस्सर हुआ राहत से कभिइ मेल हमें
जान पर खेल के भाया ना कोइ खेल हमें
एक दिन क्या भी ना मंज़ूर हुआ बेल हमें
याद आएगा अलिपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को
अंडमान खाक तेरी क्यूँ ना हो दिल में नाज़ां
छके चरणों को जो पिंगले के हुई है ज़ीशान
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहाँ
आते आते जो रहे ‘बाल तिलक’ भी मेहमां
‘मंडाले’ को ही यह आइज़ाज़ मिला पाने को
बात तो जब है की इस बात की ज़िद्दे थानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोइ, उसकी ना हरगिज़ मानें
बहते हुए ख़ून में अपना ना ग़रेबान सानें
नासेहा, आग लगे इस तेरे समझाने को
अपनी क़िस्मत में आज़ाल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहान रक्खा था, गम रक्खा था
किसको परवाह थी और किस्में ये दम रक्खा था
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को
हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम भी माँ बाप के पाले थे, बड़े दुःख सह कर
वक़्त-ए-रुख्ह्सत उन्हें इतना भी ना आए कह कर
गोद में आँसू जो टपके कभी रुख्ह से बह कर
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को
देश सेवा का ही बहता है लहु नस-नस में
हम तो खा बैंटे हैं चित्तोड़ के गढ़ की कसमें
सरफरोशी की अदा होती हैं यों ही रसमें
भाले-ऐ-खंजर से गले मिलाते हैं सब आपस में
बहानों, तैयार चिता में हो जल जाने को
अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फ़क़ीरों की हमेशा बोली
खून में फाग रचाएगी हमारी टोली
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोइ उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को
अपना कुछ गम नहीं पर हमको ख़याल आता है
मादार-ए-हिंद पर कब तक ज्वाल आता है
‘हरदयाल’ आता है ‘युरोप’ से ना ‘लाल’ आता है
देश के हाल पे रह रह मलाल आता है
मुंतज़ीर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को
नौजवानों, जो तबीयत में तुम्हारी ख़टके
याद कर लेना हमें भी कभी भूल-ए-भटके
आप के ज़ुज़वे बदन होये जुदा कट-कटके
और साद चाक हो माता का कलेजा फटके
पर ना माथे पे शिकन आए क़सम खाने को
देखें कब तक ये असीरा-ए-मुसीबत छूटें
मादार-ए-हिंद के कब भाग खुलें या फुटें
‘गाँधी अफ्रीका की बाज़ारों में सदके कूटें
और हम चैन से दिन रात बहारें लुटें
क्यूँ ना तरज़ीह दें इस जीने पे मार जाने को
कोई माता की ऊंमीदों पे ना ड़ाले पानी
जिन्दगी भर को हमें भेज के काला पानी
मुँह में जल्लाद हुए जाते हैं छले पानी
अब के खंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जाये कहीं ऊमर के पैमाने को
मयकदा किसका है ये जाम-ए-सुबु किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलु किसका है
जो बहे कौम के खातिर वो लहु किसका है
आसमां साफ बता दे तु अदु किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तु तड़पाने को
दर्दमंदों से मुसीबत की हलावत पुछो
मरने वालों से जरा लुत्फ-ए-शहादत पुछो
चश्म-ऐ-खुश्ताख से कुछ दीद की हसरत पुछो
कुश्त-ए-नाज से ठोकर की कयामत पुछो
सोज कहते हैं किसे पुछ लो परवाने को
नौजवानों यही मौका है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आये खुशी से झेलो
कौंम के नाम पे सदके पे जवानी दे दो
फिर मिलेगी ना ये माता की दुआएं ले लो
देखे कौन आता है ईर्शाथ बजा लाने को
Neel Nakul varma said
शहीद हूँ मैं …..
मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना …
जो अब कभी नही हँसेंगे…
जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना …
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..
जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं
तो मेरे परिवार को याद कर लेना …
जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे.
जब आप अपने बच्चो के साथ खेले ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना …
मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी
जब आप सकून से सोयें
तो मेरे परिवार को याद कर लेना …
वो अब भी मेरे लिए जागते है …
मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ…आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं ………….
Neel Nakul varma said
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है |
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है |
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है |
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है |
लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
Neel Nakul varma said
कुछ रिश्ते खून के कुछ रिश्ते हम बनाते कुछ रिश्ते वक़्त देता क्यूँ हम संभाल पाते , या वह संभल नहीं पाते
रिश्ते अगर ख़ुशी देते ,रिश्ते ही दर्द बन जाते ,रिश्ते ही आँखों की चमक ,रिश्ते ही आँसू बन दरिया आँखों से बहते जाते
मगर यह क्यूँ होता कभी सोचा …..
आओ जो मुझे मिला जो मैंने पाया जो मैं समझा उससे आप कों बतलाता हूँ जो नहीं समझा मैं भी शायद वह आपसे आज समझना चाहता हूँ
—विश्वास रिश्ते का बंधन है यह नहीं रहा तो रिश्ता बिखरते देर नहीं लगती
हम
क्यूँ ऐसा वक़्त ला खड़ा कर देते है की एक वक़्त विश्वास पर ही रिश्ता
जोड़ते और देते पर एक वक़्त वही विश्वास नहीं करते वक़्त की धरा बहुत टेडी
है
क्यूँ नहीं रहता विश्वास ,क्यूँ तोड़ डालते ,,क्यूँ पैदा होती ऐसी स्थिति जो ना चाह कर भी मुख मोड़ डालते
झूट सबसे बड़ा दुश्मन है इस विश्वास आईने नाम का
क्यूँ देते है झूट हम रिश्तो कों यह कोई बिजनेस तो नही जो नफा मुनाफा कमाने के लिए झूट बोलना पड़ेगा
रिश्ते
सच की पक्की डोर से बनते है मजबूत और मिठास घोलते है आपकी जिंदगी मे आपके
रिश्तो मे यह सच बहुत कड़वा जरुर होता है पर यह मीठा बन बाद मे आपको खुद की
नजरो से और ऊपर उठा देता है
डर रिश्ते मे होता है दो प्रेमी के ….खोने का डर ,मगर यहाँ बहुत बातो से पैदा होता है
जलन
डर एक ही है जिससे रिश्ते अक्सर टूटते है जब आप प्रेम करते है जो इबादत है
खुदा की तो जलन क्यूँ किसी से और बात करते देख या किसी के साथ देख यहाँ एक
डर पैदा होता है जिसे आप बहुत प्यार करते है उसे खोने का ..मगर विश्वास
रखेंगे तो याद रखे रिश्ता टूटे नहीं टूटेगा क्यूँ की विश्वास वो ताक़त है
जिससे आप प्रभु कों पा सकते है फिर प्यार कों क्यूँ नहीं
कभी कभी हम
अपने साथी के दोष गुण निकालते है ..मैं यहाँ यह कहूँगा की दोस्त की कमियों
कों बताये जरुर जिससे वह दूर कर समाज मे इज्जत और पा सके पर उसके दोष
निकाले मत सब के सामने जिससे वह बिखरेगा ही ना की सुधरेगा
आप अपने
रिश्तो कों वक़्त दे .समझे ,समझाए ,पढ़े ,यह बहुत अनमोल है मेरे दोस्त एक
बार कडवे हो तो फिर मीठे कर कर भी ना कडवाहट दूर होगी कहीं ना कहीं जरुर रह
जाएगी दिलो दिमाग मे ..इससे पहले यह पैदा हो वह स्थिति लाये क्यूँ ..इसलिए
कहता हूँ दूर रखो झूट कों और सच दो रिश्तो कों
अगर आप बाँट सके कुछ और बाते तो बहुत अच्छा लगेगा मुझे भी पढ़ समझ कर क्यूंकि मैं अधुरा हूँ कहीं ना कहीं ………………..
Neel Nakul varma said
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥
Neel Nakul varma said
उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा//
स्वप्न-थल का पा निमंत्रण,
प्यार का देकर अमर धन
वेदनाओं की तरी में स्थान अपना ले चुका हूँ!
मूल्य अब मैं दे चुका हूँ!
उठ पड़ा तूफान, देखो!
मैं नहीं हैरान, देखो!
एक झंझावात भीषण मैं हृदय में से चुका हूँ!
मूल्य अब मैं दे चुका हूँ!
क्यों विहँसता छोर देखूँ?
क्यों लहर का जोर देखूँ?
मैं भँवर के बीच में अब नाव अपनी खे चुका हूँ!
मूल्य अब मैं दे चुका हूँ!
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिन्दा न हों
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देख ज़िन्दाँ से परे रंगे चमन, जोशे बहार,
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख।
जिसे सींचना था मधुजल से
सींचा खारे पानी से,
नहीं उपजता कुछ भी ऐसी
विधि से जीवन-क्यारी में।
क्या है मेरी बारी में।
आंसू-जल से सींच-सींचकर
बेलि विवश हो बोता हूं,
स्रष्टा का क्या अर्थ छिपा है
मेरी इस लाचारी में।
क्या है मेरी बारी में।
टूट पडे मधुऋतु मधुवन में
कल ही तो क्या मेरा है,
जीवन बीत रहा सब मेरा
जीने की तैयारी में|
क्या है मेरी बारी में
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा…
ले लू महक आज़ादी की उनके बिना ,
वो महक जिसका उन्होंने केवल अंदाज़ लगाया होगा
तर्पण कर क्रांति की अग्निवेदी में खुद को ,
कोई अंदाज़ नहीं लपटों से सत्ता को किस कदर जलाया होगा …
Neel Nakul varma said
“आओ फरिश्तों से कुछ बात करें
बहुत उदास है ये रात
कोहरे के लिहाफ ओढ़ कर शायद तुम हो जो झांकती हो मुंडेरों से अभी
चाँद की बिंदी लगा लो अपने माथे पर
समझलो तुम सुहागिन हो
तुम्हारी मांग में शफक सिन्दूर भर कर खोगई है भोर में
मैं लौट के आऊँगा देख लेना
तन्हाईयों में गूंजती रुबाईयों जैसा
धूप में सूखती रजाईयों जैसा
मैं लौट के आऊँगा देख लेना
हादसे में हाँफते सुबह के अखबार में सिमटा
देख लो तुम्हारी गोद में सर रखे सूरज सा लेटा हूँ मैं
एक रोशन सच चरागों से चुरा लाया हूँ मैं
तुम्हारी आँख में काजल लगा दूं रात का
मैं खो जाऊंगा तह किये कपड़ों में रखे स्नेह के सुराग सा
मैं याद आऊँगा सूनी मांग से सिन्दूर के संवाद सा
तुम्हारी आँख में काजल लगा दूं रात का
मैं जाता हूँ सितारों ने बुलाया है दूर से मुझको
ओढ़ लो कोहरे की चादर
बहुत सर्द है रात.” —-