लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

बेड़ीयाँ बाकी अभी है और भी

Posted by hemjyotsana "Deep" on August 15, 2007

तोड़ चुके जंजीरें कई हम , मगर ,
बेड़ीयाँ बाकी अभी है और भी ।

ना रुको तुम देख ये ऊचाँईयाँ ,
है अभी बाकी मुकाम और भी ।

इन बुलन्दियों पर तो हम आ चुके ,
करने बहुत है काम और भी ।

सिर्फ ये ही नहीं है मज़िलें ,
रास्ता बाकी अभी है और भी ।

दे चुके दुनिया को बहुत ,अब
खुद के लिये पाना है और भी ।

हर तरफ खुशहाली बढ़े ,
कई घर है सजाने और भी ।

दीप युँ तो फैली है रोशनी अपनी ,
करना है नाम देश का और भी ।

5 Responses to “बेड़ीयाँ बाकी अभी है और भी”

  1. बढ़िया है.

  2. ‘बेड़ियां बाकी अभी हैं और भी’ – सारे शेर बहुत अच्छे हैं।
    ये शेर बड़ा अच्छा लगाः

    सिर्फ ये ही नहीं है मंज़लें,
    रास्ता बाकी अभी है और भी।’
    बधाई स्वीकारें।
    महावीर शर्मा

  3. बहुत अछूता शेर है

    तोड़ चुके जंजीरें कई हम , मगर ,
    बेड़ीयाँ बाकी अभी है और भी ।

    राह लंबी और चौडी, साथ में वीरानियां
    पर सिवा उनके हजारों अडचनायें और भी

    बहुत सुदर गजल के लिये दाद के साथ
    देवी

    चराग़े-दिल (गज़ल संग्रह)/ देवी नागरानी/सरला प्रकाशन, १५८६/ १ ई, नवीन शाहदरा, दिल्ली – ११००३२/ २००७/ पृष्ठ १४४/

    For PDF mail at devi1941@yahoo.com

  4. डा. रमा द्विवेदी said….

    हेमज्योत्सना जी,

    आज आपके ब्लाग में आना हुआ कुछ ही रचनाएं पढ़ी लेकिन सब अच्छी लगी…आप तो काफ़ी अच्छा लिखती हैं…लिखती रहें…मेरी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ हैं।

    ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगीं……

    तोड़ चुके जंजीरें कई हम , मगर ,
    बेड़ीयाँ बाकी अभी है और भी ।

  5. mehhekk said

    ek lafz hai shandar,badhiya

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