हे जीव जगत के मनुज सुन……..
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 27, 2007
हे जीव जगत के मनुज सुन ,
तू बलशाली है थक हार नही ।
जीत तेरी हर सुबह होगी ,
मानेगा जब तक तू हार नहीं ।
माना है रस्ता पथरीला ,
तू पल पल इसे निहार नहीं ।
तू सफल नहीं है आज मगर,
खुद को असफल स्वीकार नहीं ।
है अदम्य साहस का मालिक ,
ड़रना तेरा व्यवहार नहीं ।
तू रखता है शस्त्र हौसला ,
घबराना तेरा प्रहार नहीं ।
ज़श्न विजय पर गाने वाले ,
ईद दिवाली ही तेरा त्यौहार नहीं ।
पाना खोना खेल है जीवन ,
दर्द ही इसका सार नहीं ।






July 27, 2007 at 8:31 pm
अच्छी लगी आशावादी पंक्तियाँ । सरल शब्दों में प्यारी सी है ।
यूँ लगता है -
अब सुबह देर नहीं,
राही अब अँधेर नहीं ।
July 27, 2007 at 10:40 pm
बढ़िया संदेश. बधाई.
July 30, 2007 at 1:44 pm
बढिया रचना है।
August 22, 2007 at 1:07 am
बढ़िया संदेश
बढिया रचना
nice meassage
August 24, 2007 at 7:52 pm
llllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllll
August 28, 2007 at 1:31 am
I’ve no words, I don’t know how to appreciate your poem. Thanks.
December 24, 2007 at 12:13 pm
Bahut Encouraging Kavita hai Hem Jyotsna , Keep it up.
-Shashikant