लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन

Posted by hemjyotsana "Deep" on July 8, 2007

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ‘ दीप ‘ को जला कर रखना ।

7 Responses to “उड़ना हवा में खुल कर लेकिन”

  1. aditya Says:

    kya khub kahi

  2. santosh Says:

    bahut khoob zindgi ko dekhne ka nazaria pasand aaya,

  3. mehhekk Says:

    zindagi aisi hi hai

  4. vicky chawla Says:

    very nice……

  5. rukmani khatri Says:

    maashaaallah,kya khoob arj kiya hai!!!!!!!!!!!!

  6. rukmani Says:

    मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
    मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

  7. महावीर Says:

    ‘उड़ना हवा में’ हिदायत और सकारातमक दृष्टिकोण लिए एक सुंदर रचना हैः
    मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
    हर पल में ज़िन्दगी का लुत्फ उठाए रखना।

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