सायो के चेहरे कब आईने में दिखाई देते है ।
तन्हाई में , बस यादों के नगमें सुनाई देते है ।
नये रगों की रोशनी में दबते है कहाँ ,
फूल ख़्यालो के हर पल दिखाई देते है ।
उन पे हँसते है हम अक्सर तन्हाई में ,
जो समझते हमें वो ,जो हम उनको दिखाई देते है ।
वो शक्स मिट्टी से अब बनते ही नहीं ,
जो बूजुर्गो के किस्से कहानी में सुनाई देते है ।
कितने सुर और साजो से भरी है दुनिया लेकिन ,
दीप को तो बस जलने के शोर सुनाई देते है ।
बनाते है जो रिश्ते दुनिया को सुन्दर ,
वो भला क्यूँ टूटने पर दर्द भरी तबाही देते है ।
जब गुनहग़ार खुद मसीहा हो ,
तो बेगुनाह किसको और क्यूँ सफाई देते है ।
खुदा का क्या , चन्द घंटो का धोखा खुशी दे देगा ,
दर्द उसे नहीं हो तो , जो चीजें पराई देते है ।
जिससे मिलना जिन्दगी की जरुरत हो ,
हालात क्यूँ बस उसकी ही जुदाई देते है ।
जिन जख़्मों के दर्द जीने की वजह हो ,
वक्त के मरहम , ऐसे जख्मो से रिहाई देते है ।
परख कर देखलें देने वाले की नीयत हम भी ,
देखें खुदा हम को अब कितनी खुदाई देते है ।
मिट्टी का बूत ना जाने कब रूह से जुदा हो जाये ,
हम को तो चलते फिरते चेहरे भी बेज़ान दिखाई देते है ।
क्यूँ खुदा देता नहीं रोशनी देने वाले कुछ ,
‘ दीप ‘ को क्यूँ बस अन्धेरे दिखाई देते है ।