लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

Archive for जुलाई 8th, 2007

मेरा परिचय

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जुलाई 8, 2007


उम-ऎ-दराज़ कट गई इम्तहान में ,
मेरा पता मिला मुझे उसके ज़हान में ।
काटें बरस कई इन्तजार में ,
उसका निशान मिला मुझे अपने मकान में ।

मेरा पुरा नाम हेम ज्योत्स्ना पाराशर ” दीप ” है । मैं एक इन्जीनियरिगं कांलेज में लेक्चरर हूँ । मै कोटा राजस्थान में रहती हूँ । कविता अपने लिये लिखती हूँ लेकिन औरों से बाटने में आनन्द मिलता है । प्रथम कविता कक्षा 11 ( 1999 ) में लिखी थी । तब से अब लिखती आ रही हूँ ।
बचपन से ही ज़गजीत सिंह जी की ग़ज़ले सुनती आई हूँ । ऊर्दू में रुचि है परन्तू ऊर्दू लिखने पड़ने में असमर्थ हूँ प्रयास जारी है ।

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यादों के नगमें सुनाई देते है

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जुलाई 8, 2007


सायो के चेहरे कब आईने में दिखाई देते है ।
तन्हाई में , बस यादों के नगमें सुनाई देते है ।

नये रगों की रोशनी में दबते है कहाँ ,
फूल ख़्यालो के हर पल दिखाई देते है ।

उन पे हँसते है हम अक्सर तन्हाई में ,
जो समझते हमें वो ,जो हम उनको दिखाई देते है ।

वो शक्स मिट्टी से अब बनते ही नहीं ,
जो बूजुर्गो के किस्से कहानी में सुनाई देते है ।

कितने सुर और साजो से भरी है दुनिया लेकिन ,
दीप को तो बस जलने के शोर सुनाई देते है ।

बनाते है जो रिश्ते दुनिया को सुन्दर ,
वो भला क्यूँ टूटने पर दर्द भरी तबाही देते है ।

जब गुनहग़ार खुद मसीहा हो ,
तो बेगुनाह किसको और क्यूँ सफाई देते है ।

खुदा का क्या , चन्द घंटो का धोखा खुशी दे देगा ,
दर्द उसे नहीं हो तो , जो चीजें पराई देते है ।

जिससे मिलना जिन्दगी की जरुरत हो ,
हालात क्यूँ बस उसकी ही जुदाई देते है ।

जिन जख़्मों के दर्द जीने की वजह हो ,
वक्त के मरहम , ऐसे जख्मो से रिहाई देते है ।

परख कर देखलें देने वाले की नीयत हम भी ,
देखें खुदा हम को अब कितनी खुदाई देते है ।

मिट्टी का बूत ना जाने कब रूह से जुदा हो जाये ,
हम को तो चलते फिरते चेहरे भी बेज़ान दिखाई देते है ।

क्यूँ खुदा देता नहीं रोशनी देने वाले कुछ‍ ,
‘ दीप ‘ को क्यूँ बस अन्धेरे दिखाई देते है ।

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उड़ना हवा में खुल कर लेकिन

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on जुलाई 8, 2007


अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ‘ दीप ‘ को जला कर रखना ।

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