मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ ।
जर्रा हूँ , समन्दर हूँ , या तुफान हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं नहीं जानता ,
मैं खुद से अभी तक अनजान हूँ ।
पानी हूँ , कश्ती हूँ , या साहिल हूँ ,
जीवन से बन्धा एक रिश्ता या ,
रिश्तो में बन्धी एक जान हूँ ।
आँखों में छुपा एक आँसूं हूँ या ,
दिल में बसा एक अरमान हूँ ।
मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं नहीं जानता ,
मैं खुद से अभी तक अनजान हूँ ।
कौन हूँ मैं , गैर हूँ या अपना हूँ ,
बोझ हूँ किसी पर , या दुआ हूँ या ,
खुदा का किया कोई एहसान हूँ ।
मैं कौन हूँ………
खुशी हूँ , दर्द हूँ , या कोई एहसास हूँ ,
तन्हा हूँ या मैं किसी के पास हूँ ,
साज़ हूँ , राग हूँ , या दर्द भरी आवाज़ हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं नहीं जानता ,
मैं खुद से अभी तक अनजान हूँ ।
गीत हूँ , गज़ल हूँ , या शायर का कोई अन्दाज़ हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ ,
अन्त हूँ , मध्य हूँ , या कोई आगाज़ हूँ
मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,
सोचते सोचते एक उम्र गुज़र जायेगी ,
है यकीं मुझको मेरी पहचान मिल जायेगी ।
Archive for July, 2007
मैं कौन हूँ…….
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 30, 2007
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ये शिक्षक कहलाते है……
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 29, 2007
रोज सुबह मिलते है इनसे , क्या हमको करना है ,
ये बतलाते है ।
ले के तस्वीरें इन्सानों की ,सही गलत का भेद हमें ,
ये बतलाते है ।
कभी ड़ांट तो कभी प्यार से , कितना कुछ हमको ,
ये समझाते है ।
है भविष्य देश का जिन में , उनका सबका भविष्य ,
ये बनाते है ।
है रगं कई इस जीवन में ,रगों की दुनिया से पहचान ,
ये करवाते है ।
खो ना जाये भीड़ में कहीं हम , हम को हम से ही ,
ये मिलवाते है ।
हार हार के फिर लड़ना ही जीत है सच्ची , ऐसा एहसास ,
ये करवाते है ।
कोशिश करते रहना हर पल , जीवन का अर्थ हमें ,
ये बतलाते है ।
देते है नेक मज़िल भी हमें , राह भी बेहत्तर हमे ,
ये दिखलाते है ।
देते है ज्ञान जीवन का , काम यही सब है इनका ,
ये शिक्षक कहलाते है ।
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Teachers Day ki duniya mein GURU-PURNIMA
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 29, 2007
Teacher’s Day की इस दुनिया में आज गुरु पुर्णिमा जैसे विशेष दिन मैं अपनी वो कविता आप सब के सामने रख रही हूँ जो मैंने अपने विद्यालय के दिनो में लिखी थी ।
वो कौन सा है पद ,
जिसे देता ये जहाँ सम्मान ।
वो कौन सा है पद ,
जो करता है देशों का निर्माण ।
वो कौन सा है पद ,
जो बनाता है इंसान को इंसान ।
वो कौन सा है पद ,
जिसे करते है सभी प्रणाम ।
वो कौन सा है पद ,
जिकसी छाया में मिलता ज्ञान ।
वो कौन सा है पद ,
जो कराये सही दिशा की पहचान ।
गुरू है इस पद का नाम ।
मेरा सभी गुरूजनो को शत-शत प्रणाम ।
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हे जीव जगत के मनुज सुन……..
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 27, 2007
हे जीव जगत के मनुज सुन ,
तू बलशाली है थक हार नही ।
जीत तेरी हर सुबह होगी ,
मानेगा जब तक तू हार नहीं ।
माना है रस्ता पथरीला ,
तू पल पल इसे निहार नहीं ।
तू सफल नहीं है आज मगर,
खुद को असफल स्वीकार नहीं ।
है अदम्य साहस का मालिक ,
ड़रना तेरा व्यवहार नहीं ।
तू रखता है शस्त्र हौसला ,
घबराना तेरा प्रहार नहीं ।
ज़श्न विजय पर गाने वाले ,
ईद दिवाली ही तेरा त्यौहार नहीं ।
पाना खोना खेल है जीवन ,
दर्द ही इसका सार नहीं ।
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खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा …….
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 24, 2007
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।
मोम की तरह पत्थर भी अगर पिघल जाते ,
हर किसी को जहाँ में खुदा फिर मिल जाते ,
ढूँढ ने जो चला , जिन्दगी को मैं , जिन्दगी से ही हाथ धो बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।
जब खुशियाँ थी , तो पास कितने चेहरे थे ,
हमको लगता था, उनसे रिश्ते कितने गैहरे थे ,
दो घड़ी क्या मिला मैं ग़म से , साथी पुराने सभी मैं खो बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।
खूशबू सी आरही थी , जिन्दगी के गुलशन से ,
रोशन था हर नज़ारा , महके हुऐ चमन से ,
मुस्कुराते-मुस्कुराते क्या हुआ ,बस यूँ ही अचानक मैं रो बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
थक गया मैं देख-देख कर गुनाह होते हुऐ ,
देखता हुँ मैं , खुद को भी तबाह होते हुऐ ,
घर से निकला बदलने दस्तुरे-जहाँ, घर का पता ही मैं खो बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
बड़ी प्यारी थी जिन्दगी , जिन्दगी के बिना ,
बेवजह समझने चला जीवन को दर्द के बिना ,
हँसते मुस्कुराते चेहरे को ,अचानक अश्क के दागो से भर बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
पत्थर तराशता एक शक्स , खुदा से मिलने की ज़िद कर बैठा ।
हाथ लकीरों से भरे थे पहले , अब मगर छालो से भर बैठा ।
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झोंपड़े कहते है…………
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 22, 2007
इन वीरानो को अब शहर कहते है ।
यहाँ चार दीवारों को ही घर कहते है ।
धुआँ उगलती मशीनो की सड़कें है यहाँ ,
बचपन खेलें उसे गावं की गली कहते है।
बेज़ान सी जिन्दगी जीते है शहरों में ,
गावं में हर पल को जीवन कहते है ।
रगों से भरा है ये जीवन कितना ,
ये बेरगं गावं के झोंपड़े कहते है ।
ऊचीं इमारतों ने जूदा ज़मीं आसमां किये ,
मिलता है आसमां धरती से,उसे गावं कहते है ।
रोशनी जले शहरो में बेइन्तहा लेकिन ,
गावं में सुकून से जले उन्हे दीप कहते है ।
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मेरा परिचय
Posted by hemjyotsana "Deep" on July 8, 2007
उम-ऎ-दराज़ कट गई इम्तहान में ,
मेरा पता मिला मुझे उसके ज़हान में ।
काटें बरस कई इन्तजार में ,
उसका निशान मिला मुझे अपने मकान में ।
मेरा पुरा नाम हेम ज्योत्स्ना पाराशर ” दीप ” है । मैं एक इन्जीनियरिगं कांलेज में लेक्चरर हूँ । मै कोटा राजस्थान में रहती हूँ । कविता अपने लिये लिखती हूँ लेकिन औरों से बाटने में आनन्द मिलता है । प्रथम कविता कक्षा 11 ( 1999 ) में लिखी थी । तब से अब लिखती आ रही हूँ ।
बचपन से ही ज़गजीत सिंह जी की ग़ज़ले सुनती आई हूँ । ऊर्दू में रुचि है परन्तू ऊर्दू लिखने पड़ने में असमर्थ हूँ प्रयास जारी है ।
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