लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

ये शहर मेरा………

Posted by Hem Jyotsana "Deep" on मई 31, 2007

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी खुल के मिलते थे लोग यहाँ ,
अब मगर खुद से मिलने का भी वक्त कहाँ ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी बेज़ुबान पत्थर भी बात करते थे ,
अब मगर दोस्त भी अजनबी लगते है ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी खिला करता था बचपन की तरह ,
अब मगर बिखर गया है दरपन की तरह ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी बहारों का आशियाँ हुआ करता था ये ,
अब मगर पतझड़ के पेड़ सा लगता है ये ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी साथ रहते थे सब ,अकेला ना था कोई ,
अब मगर गये वक्त सा लौटा ही नहीं कोई ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
कभी होता था , जो होता था कभी ,
अब मगर इसे एक नया रगं देना है ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
आसमाँ भी वहीं है , हवा का ढ़गं भी वहीं है ,
बदलना है तो बस शहर के बाशिन्दो को ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
इसके जर्रों में फिर जिन्दगी को भरना है ,
इसको एक कल के साथ आज देना है ,

ये शहर मेरा धूप सा रंग बदलता ही रहा ।
पाया-खोया , अच्छा-बुरा जैसा भी ,
मेरा शहर मेरा है चाहे हो जैसा भी ।

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3 Responses to “ये शहर मेरा………”

  1. mehhekk said

    eisi hi to hoti hao duniya,

  2. ANIL SAXENA said

    KAMAL KA LIKTHIN HAIN AAP.

  3. ANIL SAXENA said

    WOW.TAT WAS GR8.KEEP IT UP PLZ

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