दीप तू अब रोशन हो…
Posted by hemjyotsana "Deep" on May 31, 2007
दीप तू अब रोशन हो ,
घनघोर अन्धेरे या ,
जगंल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो ।
इन्तज़ार नहीं अब कर ,
किरणों के सो जाने का ,
माना वक्त नहीं ये ,
सूरज के खो जाने का ।
ड़र मत अब तू ,
अब बस तू उज्जवल हो जा ,
अब तो तू ,
नीलगगन सा निश्छल हो जा ।
जल जल कर ,
किरणों का नव जाल बनालें ,
कण कण को ,
नव सूरज का एहसास करादें ।
दीप तू अब रोशन हो ,
घनघोर अन्धेरे या ,
जगंल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो ।
कहाँ भरा विष चन्दन में ,
सगं सर्पो के रह कर ,
महक उठे ये वन अंधियारा ,
कुछ चन्दन सा कर ।
फिर खिल उठे ,
सायो के फूल ,
दीप तू अब ,
किरणों का नव गुलशन हो ।
दीप तू अब रोशन हो ,
घनघोर अन्धेरे या ,
जगंल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो ।
कौन है कहता ,
ठोकर लगने पर ही सम्भलो ,
अन्धियारा होने से पर ही उज्जवल हो,
अन्धियारा होने से पहले ,
दीप तू अब रोशन हो ,
घनघोर अन्धेरे या ,
जगंल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो ।
दे दिलासा तपते सूरज को ,
दे दिलासा ड़रते मन को ,
नव रोशनी की तुलिका से ,
हर रगं को नव जीवन दे ।
टूट चुका है ग़र कोई ,
जीवन जीने का ,नव ढ़गं दे ,
खत्म तेरा विश्राम हो ,
शुरु तेरा अब काम को ।
दीप तू अब रोशन हो ,
दीप तू अब रोशन हो ।
दीप तू अब रोशन हो ,
घनघोर अन्धेरे या ,
जगंल सा बिहड़ मन हो ,
दीप तू अब रोशन हो ।
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