कल्पनायें सारी……….
Posted by hemjyotsana "Deep" on March 2, 2007
कल्पनायें सारी जीवन की सोच बन कर रह गई ।
जिन्दगी मुझ पर मैं जिन्दगी पर बोझ बन कर रह गई ।
महल टूटे सारे आरजू हर रेंत का ढेर बन कर रह गई ।
धूप से भागे तो छाँव मैं सर्द आहें मिली ,
दुनिया एक धूप छाँव का खेल बन कर रह गई ।
संगीत खामोशी का है , सांसें भी सुनाई देती है ,
तन्हाई जैसे दर्द की आवाज बन कर रह गई ।
जो सुना होता हैं ज़हां में ,
वो हर कहानी मेरी हकीकत बन के रह गई ।
सब हैं सासें, धङकन, हंसी, खुशी, रिश्ते-नाते ,
पर जीते हैं ऐसे जैसे जिन्दगी मौत बन कर रह गई ।
यहाँ कुछ मुझ सा नहीं यहाँ जैसी मैं नहीं ,
लगता हैं मैं किसी और युग की खोज बन कर रह गई ।
मिल ना सकी जो कभी सुरज और सहर से ,
मैं वो अधूरी रात बन कर रह गई ।
ख़्वाहिशों और ख़्वाबों का समन्दर था जहाँ हम रहते थे ,
ख़्वाहिशें बस ख़्वाहिशें बन कर रह गई ।
राधा रुकमणि अर्जुन सुदामा तो बन ना सकी ,
जिसे दर्शन ना मिले कृण्ण का मैं वो मीरा बन कर रह गई ।
सभी रखते हैं ध्यान साथ निभाते हैं सभी ,
जिसे उठाया सबने मैं वो जिम्मेदारी बन कर रह गई ।
लब्ज़ मिलना तो दूर, अश्क और खुशी भी जो ना दे सके ,
मैं वो अधूरा ऐहसास बन कर रह गई ।
जब जिसने चाहा पढ़ा और छोड दिया ,
अन्त जिसका ना बदला मैं वो किताब़ बन कर रह गई ।
सुन सको तो सुनो , हर आवाज़ मैं सुनाई देती हूँ ,
मेरी आवाज़ ख़ामोशी बन कर रह गई ।
जो जला मन्दिर में, दिवाली में, मातम में भी ,
रोशनी जिसकी बेक़ार हो मैं, “दीप” बन कर रह गई ।
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mehhekk said
just superb
महावीर said
बड़ी भावपूर्ण और मर्म को छूने वाली रचना हैः
यहाँ कुछ मुझ सा नहीं यहाँ जैसी मैं नहीं ,
लगता हैं मैं किसी और युग की खोज बन कर रह गई ।
राधा रुकमणि अर्जुन सुदामा तो बन ना सकी ,
जिसे दर्शन ना मिले कृण्ण का मैं वो मीरा बन कर रह गई ।