लम्हें जिन्दगी के

मेरी कवितायें

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हुनर मुझमैं नहीं……….

Posted by hemjyotsana "Deep" on March 2, 2007

चेहरे बदलने का हुनर मुझमैं नहीं ,
दर्द दिल में हो तो हसँने का हुनर मुझमें नहीं,
मैं तो आईना हुँ तुझसे तुझ जैसी ही मैं बात करू,
टूट कर सँवरने का हुनर मुझमैं नहीं ।

चलते चलते थम जाने का हुनर मुझमैं नहीं,
एक बार मिल के छोड जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो दरिया हुँ , बेहता ही रहा ,
तुफान से डर जाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

सरहदों में बंट जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
रोशनी में भी दिख पाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो हवा हुँ , महकती ही रही ,
आशिंयाने मैं रह पाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

सुन के दर्द और सताने का हुनर मुझमैं नही ,
धर्म के नाम पर खुन बहाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो इन्सान हुँ , इन्सान ही रहूँ ,
सब कुछ भुल जाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

अपने दम पे जगमगाने हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो रात को ही दिखुंगा ,दिन में दिख पाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो चांद हूँ तन्हा ही रहा ,
तारों की तरह साथ रह पाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

सुख में खो जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
दुख में घबराने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो जिन्दगी हुँ चलती ही रहुँ ,
व़क़्त साथ छोड जाने हुनर मुझमैं नहीं ।

त़कलीफ में अश्क बहाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
दोस्तों के सामने छिप जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो एहसास हुँ ,मन में ही बसुं ,
भगवान की तरह पत्थरों में रह पाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

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