एक मैं और एक मैं
Posted by hemjyotsana "Deep" on April 24, 2008
एक “मैं ” ….. “और एक मैं “…..
एक “मैं ” मालिक मासूम बचपन का
“और एक मैं “…. दौड़ती भागती राहों का राही |
एक “मैं ” जो बेखौफ़ मुस्कुराता ,
“और एक मैं “…. खोज में खुशियों के ,भीड़ में खो जाता |
एक “मैं” जो दीवारों से बेख़बर ,हर घर में जाता ,
” और एक मैं ” …. अपने मकान के वजूद के सपने को तरस जाता |
एक ” मैं ” झूठ सच से परे , मुस्कान लुटाता ,
“और एक मैं” … अपनी बातों में औरों को घुमाते-२ ,खुद घूम जाता |
एक “मैं ” माँ की गोद में महफूज सोता ,
“और एक मैं ” … अपनी चोटों पर खुद मरहम लगाता |
एक “मैं ” से इस….. ” और एक मैं ” के सफ़र में …..
जिंदगी की बहारें ना जाने कब पतझड़ बन गई |
कली खिली भी , पर खुशबू ना हुई |
एक “मैं ” से “और एक मैं” के बीच में ,
काश कभी खुद को “हम” में तलाशा होता |
तो आज यूँ “मैं “….. “और एक मैं ” ना होता |
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