Posted by hemjyotsana "Deep" on October 15, 2009
कल तुम गुजर रहे थे ,
या कोई ग़ज़ल गुनगुना रहा था ….
कल आहट थी कोई पहचानी ,
या कोई दरवाजे पर आ आ के जा रा था ….
कल चाँद था फलक पर ,
या तेरा चेहरा मुस्कुरा रहा था ….
मैने बहुत रोका मगर ,
वो ना था ना नज़र आरहा था ….
पागल दिल था शायद तुझे ,
तुम्हे हर शे में पा रहा था |
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Posted by hemjyotsana "Deep" on August 2, 2009
परिन्दो को कभी क्या , माँ ने उड़ना सिखाया था ,
उन्हे तो बस किसी शाख से गिरकर बताया था ।
तुम्ह भी चुप चाप चले आये हो महफ़िल से ,
तुम्हे भी क्या उसी ने जाम पिलाया था ।
हमे अब गम से दहशन नहीं कोई,
मिला के दर्द ,जाम खुशी का पिलाया था ।
शहर की गलियों के कुत्ते भी पहचान जाते ,
हिज्र के दिन किसने साथ निभाया था ।
संवर के टूट जाना है मुक्द्दर, मगर देखो ,
मेरे टूटे नसीबो पर वो भी मुस्कुराया था ।
सुना है बेवफा का तमगा दे गया वो ,
अन्धेरी रात उसने भी ये ’दीप’ जलाया था ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on July 11, 2009
दिल से तेरा ख्याल ना जाये तो क्या करूँ ।
तू ही बता तेरी याद आये तो क्या करूँ ।
हसरत है कि तुझे इक नजर देखूँ ,
किस्मत अगर ना दिखाये तो क्या करूँ ।
चारों तरफ़ तू ही नजर आये तो क्या करूँ ,
हवाये तेरी आवाज सुनाये तो क्या करूँ ।
मैं सर झुकाता हूँ सजदे में तेरे ही ,
तुझको ही ना नजर आये तो क्या करूँ ।
दिल में जलता हुँ, रात में जलता हूँ ,
तू ही “दीप” ना जलाये तो क्या करूँ ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on June 10, 2009
रंग महौब्बत का है
ताउम्र चमकता रहता है ।
इस नगरी में जादु है
गुलाल बरसता रहता है ।
क्या तुम से मिलता है ?
एक दिवाना भटकता रहता है ।
बचपन जिसके साथ है
वो हर पल चहकता रहता है ।
शाख से गिरता है
और भटकता रहता है ।
शहरों का बच्चा है
माँ को तरसता रहता है ।
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दिल रात दिन रोशन है
“दीप” जलता रहता है ।
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Posted by hemjyotsana "Deep" on April 1, 2009
रंग घुले है हवा में
मैंने रंगों रंगीनियों को कागज़ पर खिलते देखा
आवाज़ दिखती है फिजा में
मैंने मखमली आवाज़ को कागज़ पर चलते देखा
महक दिल से दिल तक समाती है
मैंने रूह की खुशबू को कागज़ पर महकते देखा
ख्वाबों से उतर के परीयाँ आती हैं
मैंने फरिश्तों को कागज़ पर उतरते देखा
बहुत सुना है मंदिर में सुकून है
मैंने लफ्जों से कागज़ पर मंदिर बनते देखा
बाग़ में मुरझाने की दहशत में हर फुल है
मैंने बगीचों को बेखौफ कागज़ पर चलते देखा
दर्द का ख़ुशी का जाम भर भर के पीया है मैंने
मैंने ज़िन्दगी को कागज़ पर झलकते देखा
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Posted by hemjyotsana "Deep" on March 9, 2009
मैने खुद को ही तबाह होते हुऎ देखा ,
जर्रे जर्रे में गुनाह होते हुऎ देखा ।
रग रग में लहू बन के जो दौड़ता था,
मैनें उसको भी स्याह होते हुऎ देखा ।
उचाँईयों से ना मेरा जिक्र करो ,
खुद को गर्दिश में पनाह होते हुऎ देखा ।
जो समझता था मुझे मुझसे ज्यादा ,
मैने उसको भी खफ़ा होते हुऎ देखा ।
गैरों की क्या बात करूँ तुमसे ,
मैनें अपने साये को जुदा होते हुऎ देखा ।
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